Sunday, 10 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

प्रभु लंका-विजय के पश्चात अयोध्या पधारे । स्वागत के लिए सारा जनसमूह उमड़ पड़ा । समाज में भी यह दृश्य दिखाई देता है । कोई विशिष्ट व्यक्ति आता है तो भीड़ उमड़ पड़ती है । पर उसमें से कुछ व्यक्ति ही निकट आ पाते हैं । कुछ लोग दूर से फूल बरसा देते हैं, जय-जयकार कर देते हैं पर अधिकांश लोगों को दूर से ही देखकर संतोष कर लेना पड़ता है । अब जिसको सामीप्य मिलता है उसे थोड़ा गर्व-सा होता है और दूर रहने वाले के मन में उलाहना का भाव आ जाता है । पर ईश्वर से मिलने में यह दृश्य सर्वथा भिन्न रूप में सामने आता है । भगवान राम ने अयोध्यावासियों के समक्ष अपने आपको अमित रूप में प्रगट कर दिया । जितने अयोध्यावासी थे प्रभु ने उतने ही रूप बना लिए । और सबको पूरे-पूरे ही मिले । जो बड़े थे उनके चरणों में प्रणाम किया, छोटों के सिर पर हाथ रखा और मित्रों को ह्रदय से लगा लिया । प्रत्येक अयोध्यावासी यही सोचकर आनन्दित हो रहा है कि प्रभु मुझसे कितना प्रेम करते हैं कि लंका से लौटकर सीधे मुझसे ही मिले । सभी व्यक्ति प्रभु-प्रेम में इतने निमग्न हो गए कि अगल-बगल देखने की उन्हें सुध ही नहीं रही । यह अच्छा ही हुआ अन्यथा वहाँ जो दृश्य था उसे देखकर वे संकट में पड़ जाते । सचमुच प्रभु ही पूर्ण प्रेम दे सकते हैं ।

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