Tuesday, 31 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

सबसे अधिक कठिन है 'कर्तत्व-अभिमान' को छोड़ पाना । आपने मूर्तिकार से जुड़ी यह कथा सुनी होगी । किसी भविष्यवक्ता ने एक मुर्तिशिल्पी को उसकी मृत्यु-तिथि बता दी । वह मूर्तिकार बड़ा अद्भुत शिल्पी था । उसकी बनाई गई मूर्तियाँ इतनी सजीव लगती थी कि लोगों के लिए भेद कर पाना सम्भव ही नहीं होता था कि वे पत्थर की हैं या जीवित व्यक्ति ही खड़ा है । अपनी मृत्यु की तिथि से पूर्व उस अवधि में उसने अन्य कोई मूर्तियाँ न बनाकर अपनी ही बारह मूर्तियों का निर्माण किया । और उस घोषित तिथि को वह स्वयं भी उन सब मूर्तियों के बीच जाकर बैठ गया । यमराज ने अपने दूतों को भेजा । वे आए पर खाली हाथ लौट गए । यमराज ने पूछा - उस मूर्तिकार को लेकर क्यों नहीं आए ? दूतों ने कहा - महाराज ! वहाँ तो तेरह मूर्तिकार बैठे हुए हैं बिल्कुल एक-जैसे । क्या उन सबको लाना है ? यमराज ने सुना तो उनके कानों में एक मन्त्र कहा और सचमुच वह मन्त्र बड़ा प्रभावशाली सिद्ध हुआ । यमराज के दूत आए और लौटकर कहने लगे - वाह ! ऐसा उत्कृष्ट मूर्तिकार तो विश्व में आज तक पैदा ही नहीं हुआ है जिसने ऐसी दिव्य रचना की हो । अगर वह मूर्तिकार मिल जाता तो हम उसका हाथ चूम लेते । बस इतना सुनना था कि मूर्तिकार झट-से उठकर खड़ा हो गया और कहने लगा कि मैं ही इसका निर्माता हूँ । यमदूतों ने मुस्कुराते हुए कहा - पकड़ में आ गए न ! अब चलो हमारे साथ । मूर्तियाँ तो जीवित रह गई,  पर मूर्तिकार मर गया । यह जीवन का बहुत बड़ा सत्य है । कर्तापन का अहं सत्य नहीं, अनादित्व ही सत्य है । अनादित्व ही रामायण का मूल दर्शन है ।

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