रामायण में कहा गया है कि धर्म और पुण्य से सुख मिलता है । और दूसरी ओर कहा गया है कि अनेक पुण्यों के संग्रह के बिना सन्तों का सानिध्य नहीं होता । पुण्य से सुख मिलता है और पुण्य से ही सन्त की प्राप्ति होती है । अब ऐसी स्थिति में यदि पुण्य के बदले भोग चाहते हैं, तो मूल्यवान वस्तु के बदले जो प्राप्त करना चाहिए था, वह नहीं लिया । उस पुण्य के द्वारा यदि हम सन्त का संग या भगवान की भक्ति चाहते हैं, तभी हम पुण्य का सच्चे अर्थों में सदुपयोग कर रहे हैं । इसका अभिप्राय यह है कि देवत्व का जो संकेत है, वह यह बताने के लिए है कि यह जो सत्कर्म है या जिन्हें हम देवता कहते हैं, वन्दनीय मानते हैं, पूजा करते हैं, उस पूजा के साथ-साथ जो दोष पुण्य के साथ बने रहते हैं, उनसे भी हम सावधान रहें ।
No comments:
Post a Comment