Sunday, 31 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सेतुबन्ध में दूसरी ओर जलचरों के साथ समस्या यह है कि ये मनुष्य को खा जानेवाले हैं । जीवन के दुर्गुण-विचार ही ये जलचर हैं । लक्ष्मणजी ने कहा था, प्रभो, आप समुद्र को सुखा दीजिए । यदि समुद्र सूख जाता तो उसके सारे जलचर भी मर जाते, पर समुद्र ने भगवान से कहा कि प्रभो ! इसमें कोई संदेह नहीं कि लक्ष्मणजी जैसे महापुरुष दुर्गुणों को क्षणभर में जलाकर नष्ट कर सकते हैं, परन्तु आप तो सब पर कृपा करने हेतु आये हुए हैं; तो क्या इन दुर्गुणों का भी सदुपयोग नहीं करेंगे ? और सचमुच भगवान इन दुर्गुणों का भी कितना सार्थक उपयोग करते हैं । अन्त में जब भगवान उस सेतुबन्ध पर खड़े हुए, तो समुद्र से निकले हुए जलचर भगवान का सौन्दर्य देखने लगे । इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि सद्गुणों को जोड़िये और दुर्गुणों को ईश्वर की ओर मोड़िये । हमारे जीवन में राग है । ये राग मानो जलचर हैं । इन्हें प्रभु की ओर मोड़ देना चाहिए ।

Saturday, 30 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

.....कल का शेष ....
सद्गुणों के संदर्भ में हमारे जीवन में दो समस्याएँ आती हैं, जिनमें एक तो है अभिमान की और दूसरी समस्या आती है, न जुड़ पाने की । सद्गुण है तो अभिमान अवश्य दिखाई देता है और फिर एक सद्गुण आता है, तो दूसरा सद्गुण दूर भागता है । ऐसी स्थिति में उपाय क्या है ? नल-नील को उपाय प्राप्त था कि उनके स्पर्श से पत्थर हल्के हो जाएँगे । सद्गुणों से अभिमान मिटाना हो तो सन्तों की कृपा प्राप्त कीजिए, सन्तों का आर्शीवाद प्राप्त कीजिए । सत्संग में जाएँगे, अभिमान की निन्दा सुनेंगे तो सद्गुणों में जो 'मैं' जुड़ा हुआ है, वह 'मैं' दूर होगा । परन्तु हल्के होने के बाद भी एक गुण दूसरे गुण के समीप कैसे आएँगे, आपस में जुड़ेंगे कैसे ? इसके लिए कहा गया कि सन्तों की कृपा के साथ-साथ, जब तक भगवन्नाम का आश्रय न लिया जाए, तब तक ये जुड़ेंगे नहीं । भगवन्नाम ही सद्गुणों को जोड़ता है । इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि यदि हम देहाभिमान के समुद्र को पार करना चाहते हैं, तो सत्संग के साथ-ही-साथ भगवन्नाम का जप करें । इन दोनों के माध्यम से साधना का एक ऐसा सेतु बनेगा, जिसके द्वारा हम देहाभिमान को पार करके भक्तिरूपा सीताजी का साक्षात्कार कर सकते हैं ।

Friday, 29 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

सेतुबन्ध में पहले पत्थर का पुल बनाया । यह सद्गुणों के द्वारा बनाया जाने वाला पुल है । यहाँ सद्गुणों के साथ जो समस्या है, वह सेतुबन्ध के सामने भी आई । पत्थर में दृढ़ता तो खूब है, पर वे उतने ही अधिक भारी भी हैं । जल में डालते ही डूब जाते हैं और केवल स्वयं ही नहीं बल्कि अपने साथ बँधने वाले को भी डुबा देते हैं । सद्गुण के साथ दो समस्याएँ थी । एक तो ये हल्के कैसे हों और दूसरी कि ये जुड़ें कैसे ? नल-नील ने छू दिया तो हल्के हो गए, पर जब उन्हें जल में डाला गया तो वे तरंगों के कारण एक-दूसरे से अलग हो गए । अब जब जोड़ने की बात आई तो हनुमानजी आगे आए । वे बोले कि एक पत्थर पर *रा* लिखो और दूसरे पर *म*, बस पत्थर जुड़ जाएँगे । ऐसा ही किया गया, पत्थर जुड़ गए और इस प्रकार निर्मित पुल से होकर बन्दरों ने समुद्र पार किया । सद्गुणों के संदर्भ में इसका अभिप्राय यह है कि हमारे जीवन में सद्गुणों के साथ दो समस्याएँ आती हैं, जिनमें एक तो है अभिमान की ।
     ....शेष कल ....

Thursday, 28 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

साधना की दृष्टि से सेतुबन्ध का बड़ा गहरा तात्विक अर्थ है । इसमें भी आप साधना के क्रमिक विकास का क्रम पाएँगे । सेतु दो तरह से बनाया गया । कुछ भाग तो पत्थरों से बनाया गया और कुछ भाग जलचरों से भी । इसे सांकेतिक रूप से कहें तो पत्थर सद्गुण हैं और जलचर दुर्गुण । समुद्र पर सेतु-निर्माण का अर्थ है कि मनुष्य जीवन में सद्गुणों का सदुपयोग कैसे करें ? पर सेतुबन्ध में इससे भी अधिक कठिन भूमिका प्रस्तुत की गई कि क्या दुर्गुणों का भी सदुपयोग हो सकता है ?

Wednesday, 27 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

यदि कोई नदी हो और घोषणा कर दी जाए कि अमुक योगी नदी को आकाशमार्ग से पार करेंगे, तो लाखों आदमी उसे देखने को उमड़ पड़ेंगे और बड़ी श्रद्धा से उनकी पूजा-वन्दना करने लगेंगे । लेकिन इससे हमारी समस्या का समाधान तो नहीं हुआ । दूसरे दिन जब हमें नदी पार करनी होगी, तो हमारे सामने फिर वही समस्या आएगी । योगियों का दर्शन तो हो गया, पर हम स्वयं नदी कैसे पार करें ? इसलिए सरल पद्धति तो यही है कि जिनमें क्षमता है, वे यदि सेतु का निर्माण कर दें, तो फिर छोटे-से-छोटा व्यक्ति और इतना ही नहीं, पशुओं को भी पार जाने की सुविधा हो जाती है । गोस्वामीजी कहते हैं कि बेचारी चींटी तो कभी नदी कर पाने की कल्पना ही नहीं कर सकती, पर पुल बन जाने पर इतनी सुविधा हो गई कि चींटी भी बड़ी सरलता से इस पार से उस पार चली गई । अतः साधना का ऐसा रूप होना चाहिए कि जिसमें बड़े-से-बड़े व्यक्ति से लेकर छोटे-से-छोटे व्यक्ति भी उसी सत्य का साक्षात्कार कर सकें । यही सेतु का वास्तविक तात्पर्य है ।

Tuesday, 26 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

समुद्र तट पर भगवान राम के समक्ष पार जाने को लेकर दो मत सामने आते हैं । समस्या यह थी कि समुद्र को कैसे पार किया जाय ? उसे पार करने का एक उपाय तो विभीषण बताते हैं । वे कहते हैं कि समुद्र से प्रार्थना कीजिए । और दूसरा उपाय श्रीराम के अनुज लक्ष्मणजी सुझाते हैं कि प्रभु ! आपके बाण में अपार शक्ति है, धनुष और बाण चढ़ाइये और समुद्र को सुखा दीजिए । पर अन्त में जब समुद्र सामने आता है, तो वह भगवान से अनुरोध करता है कि प्रभो, यदि आप सुखाकर चले जाएँगे, तो उससे आपका चमत्कार तो प्रकट हो जाएगा, पर आपके अवतार का उद्देश्य केवल महिमा प्रगट करना तो है नहीं, आपका उद्देश्य हर व्यक्ति को ऐसा प्रशस्त पथ देना है, साधना की ऐसी क्रमिक पद्धति देनी है, जिससे हर व्यक्ति उस सत्य तक पहुँच सके, जिस तक कोई बिरले ही महापुरुष छलाँग लगाकर पहुँच पाते हैं । अतः अनगिनत बन्दरों को साथ लेकर चलने का मार्ग तो सेतु का ही मार्ग हो सकता है ।

Monday, 25 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान के अवतार का उद्देश्य क्या है ? अकेले व्यक्ति की साधना का सत्य तो ऐसा हो सकता है कि वह ऐसी अतुलनीय सामर्थ्य रखता हो कि एक ही छलाँग में परमार्थ को प्राप्त कर ले, पर यदि उसे हजारों लोगों को साथ लेकर चलना हो, तो यदि वह व्यक्ति छलाँग मार्ग से अपने पराक्रम का प्रदर्शन करे तो इसमें उसकी महिमा तो दिखाई देगी, पर बेचारे अन्य चलने वाले लोग उस गति के साथ चलने में असमर्थ हो जाएँगे । इसलिए महापुरुष जब चलते हैं, तो अपनी चाल से नहीं चलते ! जिन लोगों को लेकर चलना है, उनकी जितनी क्षमता है, उसके अनुकूल चलते हैं । स्वयं भगवान राम का जो मार्ग है, वह पैदल मार्ग है और सारे बन्दरों को साथ लेकर चलने का मार्ग है ।

Sunday, 24 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

......कल का शेष.....
लेकिन कुछ पात्रों के जीवन में सीढ़ी का मार्ग नहीं दिखाई देता । किन्हीं पात्रों के जीवन में हमें ऐसा दिखाई देता है, जिसे हम छलाँग का मार्ग कह सकते हैं । छलाँग का मार्ग कहने का अभिप्राय यह है कि कुछ लोग ऐसे विलक्षण होते हैं, जो सीढ़ी की क्रमिक साधना से न चलकर, ऐसी छलाँग लगाते हैं कि एक छलाँग में ही वे ऊपर दिखाई देने लगते हैं । यदि हम बालि और सुग्रीव के चरित्र की तुलना करें, तो हम यही कहेंगे कि सुग्रीव के चरित्र में तो क्रमिक विकास है, वे सीढ़ी के मार्ग से ऊपर चढ़ते हैं, पर बालि के चरित्र में विशेषता यह है कि प्रारंभ में तो वह एकदम नीचे दिखाई देता है, पर जब उसने छलाँग लगाई, तो एक बार में ही वह इतना ऊपर पहुँच जाता है जहाँ तक पहुँचने में सुग्रीव को काफी समय लग जाता, परन्तु ध्यान रहे, यह छलाँग वाला मार्ग कोई ऐसा मार्ग नहीं है, जिसके लिए किसी को उत्साहित करना उचित हो । वस्तुतः मार्ग का जब वर्णन किया जाएगा, तो सोपानवाले मार्ग का ही वर्णन होगा । परन्तु आप इतिहास को उठाकर पढ़िए, पुराणों को पढ़िए, मानस के पात्रों को देखिए, तो पाएँगे कि कुछ ऐसे भी पात्र अवश्य हैं, जिनके जीवन में छलाँग है ।

Saturday, 23 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

ऐसा लगता है कि बालि और सुग्रीव में से प्रभु ने सुग्रीव को अधिक महत्व दिया । भगवान राम ने उन्हें मित्र के रूप में स्वीकार किया और बालि के ऊपर बाण का प्रहार किया । पर यदि आध्यात्मिक सत्य की दृष्टि से विचार करके देखें, तो दोनों के चरित्र में आपको एक अनोखा अन्तर दिखाई देगा । उस अनोखे अन्तर के लिए मैं एक शब्द का प्रयोग करना चाहूँगा कि एक मार्ग तो वह है, जिसमें सीढ़ियाँ होती हैं, यह साधना के क्रमिक विकास का मार्ग है । जैसे आप ऊपर की ओर चढ़ना चाहते हैं, तो पहले सीढ़ियाँ बनाई जाती हैं और उन सीढ़ियों के माध्यम से एक के बाद दूसरी सीढ़ी पर पैर रखते हुए व्यक्ति ऊपर उठता है । इसी प्रकार साधना में धीरे-धीरे आगे बढ़ने के लिए सोपान बनाए जाते हैं, किन्तु यह सीढ़ी वाला मार्ग कोई बहुत सरल मार्ग नहीं होता । इसमें थोड़ा-सी असावधानी से नीचे गिरने का डर बना रहता है । जो इन सीढ़ियों पर चढ़ता है, वह बड़ी सावधानी से पैर रखता है और अन्त में इन सीढ़ियों के माध्यम से वह ऊपर पहुँच जाता है ।
     .......शेष कल....

Friday, 22 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मानस में बालि निन्दनीय है या वन्दनीय ? वह अच्छा पात्र है या बुरा ? सामान्यतः हमारे मन में यही धारणा आती है कि बालि बुरा पात्र है और इसकी पुष्टि इस बात से हो जाती है कि भगवान ने बालि पर बाण से प्रहार किया । केवल प्रहार ही नहीं, बल्कि कठोर-से-कठोर शब्दों में उसकी भर्त्सना भी की, उस पर अनेक आरोप लगाए । उन आरोपों से तो यही लगता है कि बालि निन्दनीय पात्र है । लेकिन अंगद का परिचय जब भी दिया गया, बालितनय के रूप में दिया गया, पर एक भी प्रसंग ऐसा नहीं है, जहाँ उन्हें बालितनय कहकर उन पर कटाक्ष किया गया हो या उसके निन्दनीय पक्ष की ओर संकेत किया गया हो । बालितनय कहकर सदा उनकी प्रशंसा की गई और यह शब्द प्रभु को इतना प्रिय था कि जब वे अंगद को कुछ कहना चाहते थे, तो वे उन्हें अंगद की जगह बड़े स्नेह से बालितनय ही कहते थे । अंगद की प्रशंसा के हर प्रसंग में जब उनका स्मरण बालि के पुत्र के रूप में किया गया, तो इसमें आध्यात्मिक साधना का बड़ा ही सार्थक संकेत है ।

Thursday, 21 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मानस में अंगद के सन्दर्भ में जितनी भी पंक्तियाँ आई हैं, उन सबमें यह बात आपको स्पष्ट दिखेगी कि अंगद के लिए जिस शब्द का सर्वाधिक प्रयोग किया गया है, वह है 'बालितनय' । यह बात अपने आप में कुछ विचित्र-सी प्रतीत होती है, क्योंकि परंपरा यह है कि जब हम किसी व्यक्ति का स्मरण किसी प्रसंग में करते हैं, तो यदि उसकी निन्दा या आलोचना करनी हो तो उसका संबंध हम ऐसे व्यक्ति से जोड़ते हैं, जो बुरा हो और जब किसी व्यक्ति की प्रशंसा करना चाहते हैं, तो उसका संबंध किसी श्रेष्ठ व्यक्ति से जोड़ते हैं । मानस में भी इसी पद्धति का प्रयोग किया गया है । ऐसी स्थिति में बालितनय के रूप में अंगद का परिचय दिया जाना, एक प्रश्न उपस्थित करता है कि बालितनय कहना अंगद की प्रशंसा है या निन्दा ? इसका उत्तर जानने के लिए हमें बालि के चरित्र पर विचार करना होगा ।

Wednesday, 20 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी के लिए राम एक प्रतीक नहीं हैं, 'मिथ' नहीं हैं, माध्यम नहीं हैं । वे तो उनके आराध्य हैं । गोस्वामीजी भगवान राम की विजय गाथा का मानस में वर्णन करते हैं तो संसार के व्यक्तियों या राजाओं की 'जय' से वे इसे भिन्न रूप में देखते हैं । संसार में एक व्यक्ति या एक राजा की विजय का अर्थ होता है दूसरे व्यक्ति या राजा की पराजय । पर भगवान राम की विजय का अर्थ दूसरे की पराजय न होकर सबकी विजय है । श्रीराम की जय में सबकी जय है ।

Tuesday, 19 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गीता में स्थितप्रज्ञ और सन्त दोनों के लक्षणों का वर्णन किया गया है । आपको सन्तत्व और स्थितप्रज्ञता में एक सूक्ष्म अन्तर मिलेगा । स्थितप्रज्ञ वह है कि जिसकी प्रज्ञा  (बुद्धि) प्रत्येक स्थिति में स्थिर है । जो किसी भी घटना से विचलित नहीं होता, वह स्थितप्रज्ञ है । पर रामचरितमानस में सन्त का लक्षण बताया गया कि सन्त वह है कि जो दूसरे के दुख में दुखी हो जाता है । यद्यपि पढ़कर तो यही लगता है कि इन दोनों में परस्पर विरोध है । क्योंकि जो सन्त होगा वह स्थितप्रज्ञ नहीं होगा और जो स्थितप्रज्ञ होगा वह सन्त नहीं होगा । पर भगवान राम के व्यक्तित्व में बड़े अद्भुत रूप में दोनों का सामंजस्य विद्यमान है, तथा दोनों की ही सार्थकता है । और इस सूत्र को हमें समझ लेना चाहिए । हम अपनी पीड़ा, अपने दुख में स्थितप्रज्ञ बनें इसमें तो शोभा है । लेकिन अगर हम दूसरों की पीड़ा के समय भी स्थितप्रज्ञ बन जायँ, तो क्या यह स्थितप्रज्ञता कही जायेगी ?

Monday, 18 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जब नारद को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने निर्णय किया कि मैं भगवान के पास बैकुंठ चलूँगा, तब भगवान नारद को बीच रास्ते में रोक देते हैं, कि नारद ! सही लक्ष्य तक पहुँचने की इच्छा ही यथेष्ट नहीं है, इसके साथ-साथ व्यक्ति के जीवन में सही मार्ग की भी आवश्यकता है । मुझे लगता है कि तुम्हारा लक्ष्य बुरा नहीं है, पर तुम मार्ग से भटक गये हो । इसके पश्चात भगवान देवर्षि नारद से वार्तालाप करके उनको वहीं से लौटा देते हैं । इसका अभिप्राय है कि जीवन में किसी भी व्यक्ति का लक्ष्य बुरा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति जीवन में सुख पाना चाहता है, शान्ति पाना चाहता है, परमानन्द पाना चाहता है । इसमें तो कोई भेद नहीं है पर उन्हें प्राप्त करने के लिए जिन साधनों का हम प्रयोग करते हैं उनसे अगर सुख के स्थान पर दुख का अनुभव हो रहा है तो इसका अर्थ हमें यही लेना चाहिए कि शायद हम सही मार्ग पर नहीं हैं और इस बात का हमें अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि इतना विलम्ब लगने पर भी अगर हम लक्ष्य तक नहीं पहुँच पा रहे हैं तो हमारा कर्तव्य है कि किसी मार्ग के विशेषज्ञ महापुरुष के चरणों का आश्रय लेकर हम उनसे पूछें कि मेरे लिए उपयुक्त मार्ग कौन-सा है ?  यह कृपा करके बताइए ।

Sunday, 17 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

इन्द्र का अंश होने के नाते बालि के जीवन में वे सारे दोष विद्यमान थे, जो पुण्य तथा सत्कर्म के साथ जुड़े हुए हैं । लेकिन बालि ने उन दोषों को मिटाकर अपने जीवन में ज्ञान और भक्ति का चरम फल पाया, ज्ञान के द्वारा मुक्ति का और अंगद के समर्पण के माध्यम से जो महानतम कार्य बालि के द्वारा हुआ, वह भक्ति का फल पाया । भगवान बालि से बोले कि तुम जीवित रहो और सेवा करो । बालि ने कहा कि महाराज, मैं इस अभिमानी शरीर से सेवा नहीं करूँगा । इस देह से मुझे अब मुक्ति दें । तब ? यह मेरा पुत्र अंगद मेरा ही रूप है, मेरे ही समान बली है, इसे रख लीजिए । और इसके साथ बालि ने एक शब्द और जोड़ दिया कि मेरा पुत्र मेरे ही समान बलवान तो है, पर एक अन्तर है, मुझमें बल के साथ अभिमान था और इसमें बल के साथ विनय है ।

Saturday, 16 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जिन तत्वों के कारण देवताओं की निन्दा और प्रशंसा की गई है, वे ही तत्व इन्द्र के अंश से जन्मे बालि में भी है । अभिमान तथा प्रदर्शन की वृत्ति के कारण ही वह रावण से युद्ध कर उसे पराजित करता है और उसे बगल में दबाए हुए सारे संसार में घूमता रहता है । क्या उसे ब्रह्मा की बात याद नहीं थी कि भगवान अवतार लेंगे ? बिल्कुल याद थी । रामायण में आप पढ़ते हैं कि तारा के रोकने पर बालि ने कहा था कि राम साक्षात भगवान हैं । इसका अर्थ है कि बालि को पता था कि भगवान अवतार लेंगे । लेकिन भगवान के अवतार के पहले ही रावण को हराने में भी उसकी वही अभिमान की वृत्ति थी कि ब्रह्माजी ने कहा है कि श्रीराम के साथ जाकर रावण को हराना, पर यदि मैं श्रीराम के साथ जाकर रावण को हरा भी दूँगा, तो कीर्ति तो राम की ही होगी, हमें कोई विजेता मानेगा नहीं । दूसरी ओर भगवान अपनी कीर्ति को बाँटने के लिए इतने व्यग्र हैं कि युद्ध समाप्त होते ही वे बन्दरों से कहते हैं कि तुम्हारे बल से ही मैं रावण को मार सका ।

Friday, 15 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रावण से युद्ध के समय जब इन्द्र ने भगवान श्रीराम के पास अपना रथ भेजा, तो स्वयं भेजा, प्रभु ने नहीं मँगाया । उन्हें रथ की क्या ज़रूरत ? पर जब इन्द्र ने भेजा, तो प्रभु ने उसे स्वीकार किया । यही है उनकी महानता और साधना का भी यही सत्य है । आपके लिए यदि कोई समय पर सवारी न भेजकर बाद में भेजे, तो आप बिगड़कर कहेंगे कि ले जाओ अपनी गाड़ी, हमें नहीं चाहिए । लेकिन जब इन्द्र का रथ आया, तो आवश्यकता न होते हुए भी भगवान ने उसे स्वीकार किया । यह नहीं कहा कि ले जाओ अपना रथ, हमें नहीं चाहिए । भगवान तो प्रसन्न होकर बोले कि यह रथ क्या इन्द्र ने भेजा है ? स्वागत है । और वे उस रथ पर बैठ गए । भगवान का अभिप्राय मानो यह था कि भाई, सत्कर्म में कुछ-न-कुछ कमियाँ तो रहती ही हैं, पर उसका यह अर्थ नहीं कि उस पुण्य या सत्कर्म का, उस सेवा का हम तिरस्कार करें । केवल अभिमान ही तो बाधक था, यदि वह हट गया, तो ये जितने सत्कर्म और सद्गुण हैं, उन्हें जीवन में स्वीकार करना चाहिए । सत्कर्म में अभिमान का मिटना भी जरूरी है और अभिमानरहित सेवा को स्वीकार कर उसका सदुपयोग करना भी अपेक्षित है ।

Thursday, 14 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज में इन्द्र की पूजा बन्द कराकर गिरिराज गोवर्धन की पूजा के लिए ब्रजवासियों को कहा । इन्द्र भी भगवान शंकर की तरह यह अर्थ ले सकते थे कि भगवान जिसकी पूजा करना चाहें, वह पूज्य हो जाता है, परन्तु अभिमान के कारण वे क्रोध में भरकर सारे ब्रज को नष्ट करने पर तुल गए । उन्होंने सारे मेघों को आज्ञा दी कि घोर वर्षा करके ब्रज को डुबो दो । तब भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन धारण कर ब्रज की रक्षा की । भगवान ने अपनी कनिष्ठिका अँगुली पर गोवर्धन को उठाया, पर ग्वाल-बालों से कहा कि तुम लोग भी अपनी लाठियाँ और अपने-अपने हाथ लगा दो । यह साधन और कृपा का सामंजस्य है । भगवान के ऊपर विश्वास के साथ-साथ भगवान के आदेश से स्वयं भी सेवा कार्य करना ।

Wednesday, 13 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान राम ने जब रामेश्वर में भगवान शंकर की मूर्ति स्थापित करके पूजा की, तो पार्वती ने पूछा कि महाराज, रावण की पूजा लेने तो आप लंका चले जाते हैं, लेकिन भगवान राम ने पूजा की, तो आप पूजा लेने नहीं गए और उन्हें मूर्ति बनाकर पूजा करनी पड़ी । रावण चैतन्य की पूजा करता है और श्रीराम को जड़ मूर्ति की पूजा करनी पड़ी । यह क्या बात है ? शंकरजी ने हँसकर कहा कि पार्वती तुम समझी नहीं । रावण तो मुझ चैतन्य को देखकर भी चैतन्य रूप में नहीं देख पाता, लेकिन हमारे प्रभु तो इतने बड़े हैं कि वे जिस पत्थर को छू दें, वही शंकर बन जाता है । उन्हें मेरी जरूरत नहीं है, वे तो जिस कण को स्पर्श कर देंगे, वही शंकर हो जायेगा ।

Tuesday, 12 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भागवत की कथा आपने सुनी होगी - ब्रजवासी इन्द्र की पूजा किया करते थे । एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने पूछा कि यह इतनी बड़ी तैयारी किसलिए हो रही है । लोग बोले कि हम लोग इन्द्र की पूजा करते हैं, उसी की हो रही है । भगवान ने ऐसा भाषण दिया कि उन लोगों के मन में यह बात आ गई कि अब हम इन्द्र की पूजा छोड़कर गिरिराज गोवर्धन की पूजा करेंगे । भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पूजा बन्द करा देने पर इन्द्र को बड़ा क्रोध आया, अच्छा, तो यह बालक मेरी पूजा बन्द कराकर एक पहाड़ की पूजा करा रहा है ? वेदों में तो गोवर्धन पूजा के नहीं, मेरी ही पूजा के मन्त्र हैं । इन्द्र क्रोध से उबल रहे हैं, पर भगवान तो उन पर कृपा करके उनका अभिमान दूर कर रहे थे । इन्द्र यदि भावुक होते, तो समझ जाते कि सचमुच व्यक्ति बड़ा नहीं है । भगवान पर्वत की पूजा क्यों करा रहे हैं ? वस्तुतः पूज्य तो ईश्वर हैं और वे अपने संकल्प से चाहे जिसे पूज्य बना देते हैं । व्यक्ति में अपनी पूज्यता कुछ भी नहीं होती । यदि इन्द्र में यह वृत्ति आती, तो वे धन्य हो जाते ।

Monday, 11 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामायण में कथा आपने सुनी होगी - इन्द्र ने भगवान राम के लिए रथ कब भेजा ? जब कुम्भकर्ण मारा गया, मेघनाद मारा गया, बड़े-बड़े योद्धा मारे गए और रावण से भगवान की पहले दिन की लड़ाई समाप्त हो गई, तब कहीं जाकर इन्द्र ने रथ भेजा । इतना विलम्ब करने के पीछे इन्द्र का मनोविज्ञान क्या है ? वही अभिमान और संशय । इन दोनों से मुक्ति पाना बड़ा कठिन है । ईश्वर के प्रति पूर्ण विश्वास हो जाए, रंचमात्र संशय न रह जाए, अभिमान न रह जाए । इसी अभिमान और संशय के कारण इन्द्र रथ भेजने में विलम्ब करते हैं । संशय क्या है ? इन्द्र स्वर्ग में बैठे निरन्तर युद्ध को देख रहे हैं । राम और रावण का युद्ध चल रहा है, पर अभी तक इन्द्र को राम की महिमा पर पूरी आस्था नहीं है । युद्ध में तरह-तरह के उतार-चढ़ाव आते देखकर इन्द्र को लगता है कि कहीं रावण ही तो नहीं जीत जाएगा ? ऐसा न हो कि हम रथ भेज दें और रावण बाद में हमारी खबर ले कि अच्छा, तुमने रथ भेजा था ? जब देख लिया कि अब तो निश्चित रूप से श्रीराम की विजय हो रही है और वे ऐसे भी जीत ही जाएँगे, तब सोचने लगे कि अब यदि रथ नहीं भेजेंगे तो कहने को हो जाएगा कि इस महान युद्ध में इन्द्र ने भगवान को कोई सहयोग नहीं दिया ।

Sunday, 10 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

इन्द्र के जितने रूप हैं, उन सबमें जो दुर्बलता पग-पग पर दिखाई देती है वह है अभिमान तथा ईर्ष्या की वृत्ति । जहाँ पर सत्कर्म है, वहाँ अभिमान की आशंका बनी रहती है और ईर्ष्या की वृत्ति ! आप अपने सत्कर्म के द्वारा किसी उच्च पद को पा लें, तो इसके साथ यह भय भी बना रहेगा कि कहीं आपको इस पद से हटना न पड़े । दूसरा भय यह कि हमारे पद पर कोई दूसरा न बैठ जाए । बेचारे इन्द्र इस भय से मुक्त नहीं हो पाते । ऐसे अनेक प्रसंग आते हैं, जिनमें इन्द्र की यह दुर्बलता प्रकट होती है । यह मानो भोग, सत्ता और पद के सहज-स्वाभाविक दोष हैं, जो इन्द्र के चरित्र में दिखाई देते हैं । और इसी का प्रतिबिंब बालि के चरित्र में है ।

Saturday, 9 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

मोह का भागना और मोह का भंग होना, दोनों में पार्थक्य है । बालि के हाथों रावण की पराजय को लोगों ने बड़ा महत्व दिया । स्वाभाविक भी है, क्योंकि रावण सबको हरा देता था । पर इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि एक क्षण ऐसा भी आया जब मोह सत्कर्म के सामने पराजित हो गया । पर इसमें व्यंग्य क्या है ? बालि ने रावण को हरा तो दिया, पर मारा नहीं, अपितु उसे अपनी बगल में दबा लिया । कब तक ? छह महीने तक उसे अपने बगल में दबाए संसार की परिक्रमा करता रहा । उसका उद्देश्य क्या था ? पुण्यात्माओं में पायी जानेवाली दुर्बलता ! बालि ने मोह को परास्त करने में सफलता तो पा ली, पर उसे लगा कि मेरे इस महान विजय को तो किसी ने देखा नहीं । यदि मैं लोगों से कहूँ कि मैंने रावण को हरा दिया, तो पता नहीं लोग विश्वास करेंगे या नहीं, इसलिए बगल में प्रमाण-पत्र दबाए घूम-घूमकर दिखा रहा था कि देख लो, मैं कितना बड़ा पुण्यात्मा हूँ, मैंने बुराई को परास्त कर दिया है । उसने रावण रूपी बुराई को मिटाया नहीं, बगल में दबा लिया है और साथ ही उसका प्रदर्शन भी चल रहा है ।

Friday, 8 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

रामायण में जो कहा गया कि सारे संसार में रावण का राज्य था, तो इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि जीवनभर हम मोह के शासन में रहें और घण्टे भर के लिए मोह से मुक्त हों, तो उसे मोह का राज्य ही तो कहा जाएगा । अब आप कथा में आए हुए हैं, तो यही मानना होगा कि इस समय आप मोह से मुक्त हैं, पर प्रश्न है कि मोह मिट चुका है या दबा हुआ है ? ज्योंही हम कथा से उठकर जाते हैं, वह फिर हम पर सवार हो जाता है, भले ही वह बगल में दबा हुआ चला जाए । *"बिनु सत्संग न हरिकथा तेहि बिनु मोह न भाग"*। सत्संग में मोह भागता तो है, पर मरता नहीं । इसलिए मानस में बहुकाल शब्द भी जोड़ दिया गया । सत्संग से कुछ समय के लिए तो मोह भागेगा, पर वह न जाने कब लौट आए । दीर्घकाल तक सत्संग करने से ही मोह भंग होगा - *तबहिं होइ सब संसय भंगा । जब बहुकाल करिय सत्संगा ।।*

Thursday, 7 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मोह को दबा लेना बड़ा कठिन भी है और सरल भी । इसी कारण रावण के सन्दर्भ में भी बड़ी अनोखी बात कही गई है । एक ओर तो यह कहा गया है कि रावण ने सारे संसार को जीत लिया है और दूसरी यह भी बात आती है कि रावण को तो बालि ने हरा दिया, सहस्त्रार्जुन ने हरा दिया । यहाँ विरोधाभास है । रावण विश्वविजेता है । इतने लोगों से हारकर तो उसे विजेता की उपाधि नहीं मिलनी चाहिए थी, पर जीवन का सत्य यही है । हमारे और आपके जीवन में भी तो कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जब हम थोड़े समय के लिए लोभ छोड़ देते हैं, काम से मुक्त हो जाते हैं, क्रोध पर नियन्त्रण कर लेते हैं, मोह की वृत्ति को दबा लेते हैं । यह बात तो हर व्यक्ति के जीवन में होती है । क्या क्रोधी निरन्तर क्रोध ही करता रहता है ? क्या ऐसा कोई कामी है, जो निरन्तर काम में लिप्त रह सके ? इसका सीधा तात्पर्य यह है कि भले ही हम क्षणभर के लिए काम को हरा दें, कुछ देर के लिए लोभ पर विजय पा लें और उस क्षण को हम इतना महत्वपूर्ण समझें, तो क्या उतने से ही मान लें कि हमने तो शाश्वत विजय पाई ली । रामायण में जो कहा गया कि सारे संसार में रावण का राज्य था, तो इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि जीवनभर हम मोह के शासन में रहें और घण्टे भर के लिए मोह से मुक्त हों, तो भी उसे मोह का राज्य ही तो कहा जाएगा ।

Wednesday, 6 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

दो शैलियाँ हैं - एक तो बुराइयों को दबाने की और दूसरी बुराइयों को मिटाने की । सही पद्धति तो केवल रोग को दबाना नहीं, उसे मिटाना है । बालि के चरित्र में जो संकेत आता है कि उसने रावण को हरा तो दिया, पर उसे मिटाया नहीं । बड़ी सांकेतिक भाषा है । उसने रावण को हराकर उसे बगल में दबा लिया । यह 'दबा लेना' शब्द बड़े महत्व का है । इसका अर्थ यह है कि एक समय उसने जीवन में बुराई को दबा लिया । याद रखिए रोग या बुराई के दब जाने से निश्चिंत होने की बात नहीं है, बल्कि वह और खतरनाक है, क्योंकि रोग की अनुभूति होती रहे तो रोगी पथ्य करता है, सावधान रहता है । पर यदि वह कोई ऐसी दवा ले ले, जिससे कुछ काल के लिए पीड़ा की अनुभूति बिल्कुल ही गायब हो जाए, तब तो मनुष्य के मन में निश्चिन्तता आ जाएगी । बालि की पद्धति में सबसे दोषपूर्ण बात यह है कि वह पाप को मिटाने की नहीं, दबाने की चेष्टा करता है । बालि के समान जो पाप और मोह को दबा लेगा, उसका वही परिणाम होगा, जो आगे चलकर बालि के जीवन में दीख पड़ता है ।

Tuesday, 5 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

बन्दरों में बालि ही एक ऐसा था, जिसका व्यवहार भिन्न हुआ । वह भगवान के आने की प्रतीक्षा न करके, पहले से ही शक्ति-प्रदर्शन करने लगा । वह बड़े-बड़े वीरतापूर्ण कार्य करने लगा । आप पढ़ते हैं कि रावण और बालि में संघर्ष हुआ और बालि ने रावण को हरा दिया । मायावी राक्षस ने बालि को चुनौती दी और बालि ने उसे उसके साथियों सहित मार डाला । इसका अर्थ यह है कि बालि एक ऐसे योद्धा के रूप में आता है, जो दुर्गुण-दुर्विचारों को हराने में समर्थ है । लेकिन हम इस विजय को किस अर्थ में लें ? कुछ लोग कहते हैं कि हम जीवन में सत्कर्म करें, ईश्वर की क्या आवश्यकता है, पर मानस का दृष्टिकोण ऐसा नहीं है । कहीं ऐसा न हो जाए कि हम ईश्वर की अवहेलना करके मात्र अपने पुरुषार्थ के द्वारा दुर्गुणों के खिलाफ युद्ध करने लग जाएँ । इससे हम दुर्गुणों को दबा भले ही लें, पर उन्हें मिटा नहीं सकते । इन दोनों में अन्तर है ।

Monday, 4 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

ब्रह्मा ने देवताओं को आदेश दिया कि आप लोग वानर के रूप में जन्म लेकर भक्तिपूर्वक भगवान की प्रतीक्षा करें और जब वे आकर लंका पर चढ़ाई करें, तो उनके पीछे चलते हुए युद्ध करें । लंका में भगवान की विजय होगी । साधना का भी यही क्रम है । सत्कर्म में जो अभाव है, उसे दूर करने के लिए हम भगवान से प्रार्थना करें । उनकी कृपा पाने के लिए हम साधना करते हुए निरन्तर भगवान की प्रतीक्षा करते रहें । सबसे अनोखे तो हनुमानजी निकले । उन्होंने स्वयं रावण या कुम्भकर्ण से युद्ध नहीं किया । उनकी शक्ति और सामर्थ्य का वर्णन पढ़कर तो लगता है कि हनुमानजी के जैसा बलवान तो कोई था ही नहीं । पर उनके चरित्र का तत्व क्या है ? वे अपने बल का उपयोग तभी करते हैं, जब प्रभु मिल जाते हैं और जब वे उन्हें यह काम सौंपते हैं । अभिप्राय यह कि हनुमानजी भगवत्प्राप्ति के बाद भगवान के यन्त्र के रूप में, भगवान जैसी प्रेरणा देते हैं, उसी रूप में महान कार्य सम्पन्न करते हैं ।

Sunday, 3 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

ब्रह्मा ने देवताओं को यह आदेश दिया था कि आप लोग वानर के रूप में जन्म लें और सेवा-भक्ति का व्रत लेकर भगवान के आगमन की प्रतीक्षा करें । सभी देवता बन्दर के रूप में जन्म लेकर भगवान के आने का मार्ग देख रहे हैं । अब यहाँ साधना का दूसरा तत्व आता है । साधना और सत्कर्म तो ठीक है, पर रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए या आध्यात्मिक भाषा में कहिए तो मोह और अभिमान को जीतने के लिए क्या केवल सत्कर्म और सद्गुण ही यथेष्ट हैं या कुछ और चाहिए ? इसका सूत्रात्मक उत्तर यह दिया गया कि हममें चाहे जितने सत्कर्म तथा पवित्र गुण हों, उन गुणों तथा सत्कर्मों को भगवान से जोड़ना आवश्यक है । अभिप्राय यह कि व्यक्ति के जीवन में साधना या पुरुषार्थ और भगवत्कृपा का सामंजस्य होना चाहिए । भगवत्कृपा के नाम पर यदि व्यक्ति साधना तथा पुरुषार्थ की ओर से निष्क्रिय हो जाय, तो उसने कृपा का दुरुपयोग किया और यदि साधना और पुरुषार्थ के अभिमान से उसने भगवान को भुला दिया, तो उसने भक्ति की अवहेलना की । इसलिए जीवन में दोनों का सामंजस्य होना चाहिए ।

Saturday, 2 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

लंका को जलाने के बाद हनुमानजी जब लौटकर प्रभु के पास आए, तो प्रभु उनकी प्रशंसा करने लगे । तब हनुमानजी ने क्या किया ? वे प्रभु के मुख की ओर देखने लगे, बारम्बार देखने लगे । प्रभु हँसकर बोले कि हनुमान ! तुम्हारी दृष्टि तो सदा मेरे चरणों पर ही रहा करती है, आज उसे छोड़कर मुख को इतने ध्यान से क्यों देख रहे हो ? हनुमानजी ने कहा कि प्रभो ! आप प्रशंसा तो मुख से कर रहे हैं, इसलिए मुख को देख रहा हूँ । कैसी प्रशंसा ? बोले कि जैसी प्रशंसा नारदजी की हुई, कहीं वैसी ही प्रशंसा मेरी भी तो नहीं हो रही है ? इसलिए जरा देख लिया कि मुख पर भाव क्या हैं ? प्रभु ने पूछा, तब तो तुम्हें प्रशंसा से डर लगता होगा ? बोले कि नहीं महाराज, डर एक अर्थ में तो है और दूसरे अर्थ में नहीं भी है । क्यों ? आपने नारदजी की व्यंग्य भरी प्रशंसा कर दी थी और उनको अभिमान हो गया था । तब आपने उन्हें बन्दर बना दिया था, पर मैं तो पहले से ही बन्दर बन गया हूँ, अब कोई चिन्ता नहीं है । वे सुन्दर थे तो अभिमान के कारण बन्दर बन गए, अब आप बन्दर को सुन्दर बनाएँगे, इसलिए मैं पहले से ही बन्दर बन गया हूँ । अभिमान व्यक्ति को नीचे ले जाता है, इसलिए मैं पहले से ही ऐसे रूप में आपके सामने आ गया, जिससे नीचे गिरने के भय से मुक्त हो सकूँ ।

Friday, 1 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामायण में कहा गया है कि धर्म और पुण्य से सुख मिलता है । और दूसरी ओर कहा गया है कि अनेक पुण्यों के संग्रह के बिना सन्तों का सानिध्य नहीं होता । पुण्य से सुख मिलता है और पुण्य से ही सन्त की प्राप्ति होती है । अब ऐसी स्थिति में यदि पुण्य के बदले भोग चाहते हैं, तो मूल्यवान वस्तु के बदले जो प्राप्त करना चाहिए था, वह नहीं लिया । उस पुण्य के द्वारा यदि हम सन्त का संग या भगवान की भक्ति चाहते हैं, तभी हम पुण्य का सच्चे अर्थों में सदुपयोग कर रहे हैं । इसका अभिप्राय यह है कि देवत्व का जो संकेत है, वह यह बताने के लिए है कि यह जो सत्कर्म है या जिन्हें हम देवता कहते हैं, वन्दनीय मानते हैं, पूजा करते हैं, उस पूजा के साथ-साथ जो दोष पुण्य के साथ बने रहते हैं, उनसे भी हम सावधान रहें ।