ब्रह्मा ने देवताओं को यह आदेश दिया था कि आप लोग वानर के रूप में जन्म लें और सेवा-भक्ति का व्रत लेकर भगवान के आगमन की प्रतीक्षा करें । सभी देवता बन्दर के रूप में जन्म लेकर भगवान के आने का मार्ग देख रहे हैं । अब यहाँ साधना का दूसरा तत्व आता है । साधना और सत्कर्म तो ठीक है, पर रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए या आध्यात्मिक भाषा में कहिए तो मोह और अभिमान को जीतने के लिए क्या केवल सत्कर्म और सद्गुण ही यथेष्ट हैं या कुछ और चाहिए ? इसका सूत्रात्मक उत्तर यह दिया गया कि हममें चाहे जितने सत्कर्म तथा पवित्र गुण हों, उन गुणों तथा सत्कर्मों को भगवान से जोड़ना आवश्यक है । अभिप्राय यह कि व्यक्ति के जीवन में साधना या पुरुषार्थ और भगवत्कृपा का सामंजस्य होना चाहिए । भगवत्कृपा के नाम पर यदि व्यक्ति साधना तथा पुरुषार्थ की ओर से निष्क्रिय हो जाय, तो उसने कृपा का दुरुपयोग किया और यदि साधना और पुरुषार्थ के अभिमान से उसने भगवान को भुला दिया, तो उसने भक्ति की अवहेलना की । इसलिए जीवन में दोनों का सामंजस्य होना चाहिए ।
No comments:
Post a Comment