इन्द्र के जितने रूप हैं, उन सबमें जो दुर्बलता पग-पग पर दिखाई देती है वह है अभिमान तथा ईर्ष्या की वृत्ति । जहाँ पर सत्कर्म है, वहाँ अभिमान की आशंका बनी रहती है और ईर्ष्या की वृत्ति ! आप अपने सत्कर्म के द्वारा किसी उच्च पद को पा लें, तो इसके साथ यह भय भी बना रहेगा कि कहीं आपको इस पद से हटना न पड़े । दूसरा भय यह कि हमारे पद पर कोई दूसरा न बैठ जाए । बेचारे इन्द्र इस भय से मुक्त नहीं हो पाते । ऐसे अनेक प्रसंग आते हैं, जिनमें इन्द्र की यह दुर्बलता प्रकट होती है । यह मानो भोग, सत्ता और पद के सहज-स्वाभाविक दोष हैं, जो इन्द्र के चरित्र में दिखाई देते हैं । और इसी का प्रतिबिंब बालि के चरित्र में है ।
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