Wednesday, 27 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

यदि कोई नदी हो और घोषणा कर दी जाए कि अमुक योगी नदी को आकाशमार्ग से पार करेंगे, तो लाखों आदमी उसे देखने को उमड़ पड़ेंगे और बड़ी श्रद्धा से उनकी पूजा-वन्दना करने लगेंगे । लेकिन इससे हमारी समस्या का समाधान तो नहीं हुआ । दूसरे दिन जब हमें नदी पार करनी होगी, तो हमारे सामने फिर वही समस्या आएगी । योगियों का दर्शन तो हो गया, पर हम स्वयं नदी कैसे पार करें ? इसलिए सरल पद्धति तो यही है कि जिनमें क्षमता है, वे यदि सेतु का निर्माण कर दें, तो फिर छोटे-से-छोटा व्यक्ति और इतना ही नहीं, पशुओं को भी पार जाने की सुविधा हो जाती है । गोस्वामीजी कहते हैं कि बेचारी चींटी तो कभी नदी कर पाने की कल्पना ही नहीं कर सकती, पर पुल बन जाने पर इतनी सुविधा हो गई कि चींटी भी बड़ी सरलता से इस पार से उस पार चली गई । अतः साधना का ऐसा रूप होना चाहिए कि जिसमें बड़े-से-बड़े व्यक्ति से लेकर छोटे-से-छोटे व्यक्ति भी उसी सत्य का साक्षात्कार कर सकें । यही सेतु का वास्तविक तात्पर्य है ।

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