इन्द्र का अंश होने के नाते बालि के जीवन में वे सारे दोष विद्यमान थे, जो पुण्य तथा सत्कर्म के साथ जुड़े हुए हैं । लेकिन बालि ने उन दोषों को मिटाकर अपने जीवन में ज्ञान और भक्ति का चरम फल पाया, ज्ञान के द्वारा मुक्ति का और अंगद के समर्पण के माध्यम से जो महानतम कार्य बालि के द्वारा हुआ, वह भक्ति का फल पाया । भगवान बालि से बोले कि तुम जीवित रहो और सेवा करो । बालि ने कहा कि महाराज, मैं इस अभिमानी शरीर से सेवा नहीं करूँगा । इस देह से मुझे अब मुक्ति दें । तब ? यह मेरा पुत्र अंगद मेरा ही रूप है, मेरे ही समान बली है, इसे रख लीजिए । और इसके साथ बालि ने एक शब्द और जोड़ दिया कि मेरा पुत्र मेरे ही समान बलवान तो है, पर एक अन्तर है, मुझमें बल के साथ अभिमान था और इसमें बल के साथ विनय है ।
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