साधना की दृष्टि से सेतुबन्ध का बड़ा गहरा तात्विक अर्थ है । इसमें भी आप साधना के क्रमिक विकास का क्रम पाएँगे । सेतु दो तरह से बनाया गया । कुछ भाग तो पत्थरों से बनाया गया और कुछ भाग जलचरों से भी । इसे सांकेतिक रूप से कहें तो पत्थर सद्गुण हैं और जलचर दुर्गुण । समुद्र पर सेतु-निर्माण का अर्थ है कि मनुष्य जीवन में सद्गुणों का सदुपयोग कैसे करें ? पर सेतुबन्ध में इससे भी अधिक कठिन भूमिका प्रस्तुत की गई कि क्या दुर्गुणों का भी सदुपयोग हो सकता है ?
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