मोह का भागना और मोह का भंग होना, दोनों में पार्थक्य है । बालि के हाथों रावण की पराजय को लोगों ने बड़ा महत्व दिया । स्वाभाविक भी है, क्योंकि रावण सबको हरा देता था । पर इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि एक क्षण ऐसा भी आया जब मोह सत्कर्म के सामने पराजित हो गया । पर इसमें व्यंग्य क्या है ? बालि ने रावण को हरा तो दिया, पर मारा नहीं, अपितु उसे अपनी बगल में दबा लिया । कब तक ? छह महीने तक उसे अपने बगल में दबाए संसार की परिक्रमा करता रहा । उसका उद्देश्य क्या था ? पुण्यात्माओं में पायी जानेवाली दुर्बलता ! बालि ने मोह को परास्त करने में सफलता तो पा ली, पर उसे लगा कि मेरे इस महान विजय को तो किसी ने देखा नहीं । यदि मैं लोगों से कहूँ कि मैंने रावण को हरा दिया, तो पता नहीं लोग विश्वास करेंगे या नहीं, इसलिए बगल में प्रमाण-पत्र दबाए घूम-घूमकर दिखा रहा था कि देख लो, मैं कितना बड़ा पुण्यात्मा हूँ, मैंने बुराई को परास्त कर दिया है । उसने रावण रूपी बुराई को मिटाया नहीं, बगल में दबा लिया है और साथ ही उसका प्रदर्शन भी चल रहा है ।
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