गीता में स्थितप्रज्ञ और सन्त दोनों के लक्षणों का वर्णन किया गया है । आपको सन्तत्व और स्थितप्रज्ञता में एक सूक्ष्म अन्तर मिलेगा । स्थितप्रज्ञ वह है कि जिसकी प्रज्ञा (बुद्धि) प्रत्येक स्थिति में स्थिर है । जो किसी भी घटना से विचलित नहीं होता, वह स्थितप्रज्ञ है । पर रामचरितमानस में सन्त का लक्षण बताया गया कि सन्त वह है कि जो दूसरे के दुख में दुखी हो जाता है । यद्यपि पढ़कर तो यही लगता है कि इन दोनों में परस्पर विरोध है । क्योंकि जो सन्त होगा वह स्थितप्रज्ञ नहीं होगा और जो स्थितप्रज्ञ होगा वह सन्त नहीं होगा । पर भगवान राम के व्यक्तित्व में बड़े अद्भुत रूप में दोनों का सामंजस्य विद्यमान है, तथा दोनों की ही सार्थकता है । और इस सूत्र को हमें समझ लेना चाहिए । हम अपनी पीड़ा, अपने दुख में स्थितप्रज्ञ बनें इसमें तो शोभा है । लेकिन अगर हम दूसरों की पीड़ा के समय भी स्थितप्रज्ञ बन जायँ, तो क्या यह स्थितप्रज्ञता कही जायेगी ?
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