बन्दरों में बालि ही एक ऐसा था, जिसका व्यवहार भिन्न हुआ । वह भगवान के आने की प्रतीक्षा न करके, पहले से ही शक्ति-प्रदर्शन करने लगा । वह बड़े-बड़े वीरतापूर्ण कार्य करने लगा । आप पढ़ते हैं कि रावण और बालि में संघर्ष हुआ और बालि ने रावण को हरा दिया । मायावी राक्षस ने बालि को चुनौती दी और बालि ने उसे उसके साथियों सहित मार डाला । इसका अर्थ यह है कि बालि एक ऐसे योद्धा के रूप में आता है, जो दुर्गुण-दुर्विचारों को हराने में समर्थ है । लेकिन हम इस विजय को किस अर्थ में लें ? कुछ लोग कहते हैं कि हम जीवन में सत्कर्म करें, ईश्वर की क्या आवश्यकता है, पर मानस का दृष्टिकोण ऐसा नहीं है । कहीं ऐसा न हो जाए कि हम ईश्वर की अवहेलना करके मात्र अपने पुरुषार्थ के द्वारा दुर्गुणों के खिलाफ युद्ध करने लग जाएँ । इससे हम दुर्गुणों को दबा भले ही लें, पर उन्हें मिटा नहीं सकते । इन दोनों में अन्तर है ।
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