Thursday, 7 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मोह को दबा लेना बड़ा कठिन भी है और सरल भी । इसी कारण रावण के सन्दर्भ में भी बड़ी अनोखी बात कही गई है । एक ओर तो यह कहा गया है कि रावण ने सारे संसार को जीत लिया है और दूसरी यह भी बात आती है कि रावण को तो बालि ने हरा दिया, सहस्त्रार्जुन ने हरा दिया । यहाँ विरोधाभास है । रावण विश्वविजेता है । इतने लोगों से हारकर तो उसे विजेता की उपाधि नहीं मिलनी चाहिए थी, पर जीवन का सत्य यही है । हमारे और आपके जीवन में भी तो कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जब हम थोड़े समय के लिए लोभ छोड़ देते हैं, काम से मुक्त हो जाते हैं, क्रोध पर नियन्त्रण कर लेते हैं, मोह की वृत्ति को दबा लेते हैं । यह बात तो हर व्यक्ति के जीवन में होती है । क्या क्रोधी निरन्तर क्रोध ही करता रहता है ? क्या ऐसा कोई कामी है, जो निरन्तर काम में लिप्त रह सके ? इसका सीधा तात्पर्य यह है कि भले ही हम क्षणभर के लिए काम को हरा दें, कुछ देर के लिए लोभ पर विजय पा लें और उस क्षण को हम इतना महत्वपूर्ण समझें, तो क्या उतने से ही मान लें कि हमने तो शाश्वत विजय पाई ली । रामायण में जो कहा गया कि सारे संसार में रावण का राज्य था, तो इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि जीवनभर हम मोह के शासन में रहें और घण्टे भर के लिए मोह से मुक्त हों, तो भी उसे मोह का राज्य ही तो कहा जाएगा ।

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