ऐसा लगता है कि बालि और सुग्रीव में से प्रभु ने सुग्रीव को अधिक महत्व दिया । भगवान राम ने उन्हें मित्र के रूप में स्वीकार किया और बालि के ऊपर बाण का प्रहार किया । पर यदि आध्यात्मिक सत्य की दृष्टि से विचार करके देखें, तो दोनों के चरित्र में आपको एक अनोखा अन्तर दिखाई देगा । उस अनोखे अन्तर के लिए मैं एक शब्द का प्रयोग करना चाहूँगा कि एक मार्ग तो वह है, जिसमें सीढ़ियाँ होती हैं, यह साधना के क्रमिक विकास का मार्ग है । जैसे आप ऊपर की ओर चढ़ना चाहते हैं, तो पहले सीढ़ियाँ बनाई जाती हैं और उन सीढ़ियों के माध्यम से एक के बाद दूसरी सीढ़ी पर पैर रखते हुए व्यक्ति ऊपर उठता है । इसी प्रकार साधना में धीरे-धीरे आगे बढ़ने के लिए सोपान बनाए जाते हैं, किन्तु यह सीढ़ी वाला मार्ग कोई बहुत सरल मार्ग नहीं होता । इसमें थोड़ा-सी असावधानी से नीचे गिरने का डर बना रहता है । जो इन सीढ़ियों पर चढ़ता है, वह बड़ी सावधानी से पैर रखता है और अन्त में इन सीढ़ियों के माध्यम से वह ऊपर पहुँच जाता है ।
.......शेष कल....
.......शेष कल....
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