लंका को जलाने के बाद हनुमानजी जब लौटकर प्रभु के पास आए, तो प्रभु उनकी प्रशंसा करने लगे । तब हनुमानजी ने क्या किया ? वे प्रभु के मुख की ओर देखने लगे, बारम्बार देखने लगे । प्रभु हँसकर बोले कि हनुमान ! तुम्हारी दृष्टि तो सदा मेरे चरणों पर ही रहा करती है, आज उसे छोड़कर मुख को इतने ध्यान से क्यों देख रहे हो ? हनुमानजी ने कहा कि प्रभो ! आप प्रशंसा तो मुख से कर रहे हैं, इसलिए मुख को देख रहा हूँ । कैसी प्रशंसा ? बोले कि जैसी प्रशंसा नारदजी की हुई, कहीं वैसी ही प्रशंसा मेरी भी तो नहीं हो रही है ? इसलिए जरा देख लिया कि मुख पर भाव क्या हैं ? प्रभु ने पूछा, तब तो तुम्हें प्रशंसा से डर लगता होगा ? बोले कि नहीं महाराज, डर एक अर्थ में तो है और दूसरे अर्थ में नहीं भी है । क्यों ? आपने नारदजी की व्यंग्य भरी प्रशंसा कर दी थी और उनको अभिमान हो गया था । तब आपने उन्हें बन्दर बना दिया था, पर मैं तो पहले से ही बन्दर बन गया हूँ, अब कोई चिन्ता नहीं है । वे सुन्दर थे तो अभिमान के कारण बन्दर बन गए, अब आप बन्दर को सुन्दर बनाएँगे, इसलिए मैं पहले से ही बन्दर बन गया हूँ । अभिमान व्यक्ति को नीचे ले जाता है, इसलिए मैं पहले से ही ऐसे रूप में आपके सामने आ गया, जिससे नीचे गिरने के भय से मुक्त हो सकूँ ।
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