रावण से युद्ध के समय जब इन्द्र ने भगवान श्रीराम के पास अपना रथ भेजा, तो स्वयं भेजा, प्रभु ने नहीं मँगाया । उन्हें रथ की क्या ज़रूरत ? पर जब इन्द्र ने भेजा, तो प्रभु ने उसे स्वीकार किया । यही है उनकी महानता और साधना का भी यही सत्य है । आपके लिए यदि कोई समय पर सवारी न भेजकर बाद में भेजे, तो आप बिगड़कर कहेंगे कि ले जाओ अपनी गाड़ी, हमें नहीं चाहिए । लेकिन जब इन्द्र का रथ आया, तो आवश्यकता न होते हुए भी भगवान ने उसे स्वीकार किया । यह नहीं कहा कि ले जाओ अपना रथ, हमें नहीं चाहिए । भगवान तो प्रसन्न होकर बोले कि यह रथ क्या इन्द्र ने भेजा है ? स्वागत है । और वे उस रथ पर बैठ गए । भगवान का अभिप्राय मानो यह था कि भाई, सत्कर्म में कुछ-न-कुछ कमियाँ तो रहती ही हैं, पर उसका यह अर्थ नहीं कि उस पुण्य या सत्कर्म का, उस सेवा का हम तिरस्कार करें । केवल अभिमान ही तो बाधक था, यदि वह हट गया, तो ये जितने सत्कर्म और सद्गुण हैं, उन्हें जीवन में स्वीकार करना चाहिए । सत्कर्म में अभिमान का मिटना भी जरूरी है और अभिमानरहित सेवा को स्वीकार कर उसका सदुपयोग करना भी अपेक्षित है ।
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