Wednesday, 6 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

दो शैलियाँ हैं - एक तो बुराइयों को दबाने की और दूसरी बुराइयों को मिटाने की । सही पद्धति तो केवल रोग को दबाना नहीं, उसे मिटाना है । बालि के चरित्र में जो संकेत आता है कि उसने रावण को हरा तो दिया, पर उसे मिटाया नहीं । बड़ी सांकेतिक भाषा है । उसने रावण को हराकर उसे बगल में दबा लिया । यह 'दबा लेना' शब्द बड़े महत्व का है । इसका अर्थ यह है कि एक समय उसने जीवन में बुराई को दबा लिया । याद रखिए रोग या बुराई के दब जाने से निश्चिंत होने की बात नहीं है, बल्कि वह और खतरनाक है, क्योंकि रोग की अनुभूति होती रहे तो रोगी पथ्य करता है, सावधान रहता है । पर यदि वह कोई ऐसी दवा ले ले, जिससे कुछ काल के लिए पीड़ा की अनुभूति बिल्कुल ही गायब हो जाए, तब तो मनुष्य के मन में निश्चिन्तता आ जाएगी । बालि की पद्धति में सबसे दोषपूर्ण बात यह है कि वह पाप को मिटाने की नहीं, दबाने की चेष्टा करता है । बालि के समान जो पाप और मोह को दबा लेगा, उसका वही परिणाम होगा, जो आगे चलकर बालि के जीवन में दीख पड़ता है ।

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