Tuesday, 12 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भागवत की कथा आपने सुनी होगी - ब्रजवासी इन्द्र की पूजा किया करते थे । एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने पूछा कि यह इतनी बड़ी तैयारी किसलिए हो रही है । लोग बोले कि हम लोग इन्द्र की पूजा करते हैं, उसी की हो रही है । भगवान ने ऐसा भाषण दिया कि उन लोगों के मन में यह बात आ गई कि अब हम इन्द्र की पूजा छोड़कर गिरिराज गोवर्धन की पूजा करेंगे । भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पूजा बन्द करा देने पर इन्द्र को बड़ा क्रोध आया, अच्छा, तो यह बालक मेरी पूजा बन्द कराकर एक पहाड़ की पूजा करा रहा है ? वेदों में तो गोवर्धन पूजा के नहीं, मेरी ही पूजा के मन्त्र हैं । इन्द्र क्रोध से उबल रहे हैं, पर भगवान तो उन पर कृपा करके उनका अभिमान दूर कर रहे थे । इन्द्र यदि भावुक होते, तो समझ जाते कि सचमुच व्यक्ति बड़ा नहीं है । भगवान पर्वत की पूजा क्यों करा रहे हैं ? वस्तुतः पूज्य तो ईश्वर हैं और वे अपने संकल्प से चाहे जिसे पूज्य बना देते हैं । व्यक्ति में अपनी पूज्यता कुछ भी नहीं होती । यदि इन्द्र में यह वृत्ति आती, तो वे धन्य हो जाते ।

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