Monday, 31 August 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

अयोध्या में कैकेयीजी हैं, जिन्हें भरतजी के रूप में एक ऐसा वैद्य प्राप्त हुआ जिसके अन्तःकरण में लोभ का कहीं लेश नहीं था। परिणाम यह होता है कि वे पूरी तरह स्वस्थ हो उठती है। वैसे कैकेयीजी ने वैद्य को भी अस्वस्थ बनाने की चेष्टा की थी, क्योंकि अयोध्या का राज्य उन्होंने भरतजी के लिए ही माँगा था। यह तो वैसा ही था, जैसे कोई रोगी वैद्य को ही कुपथ्य दे, रोगी बनाने की चेष्टा करे, पर सजग वैद्य रोगी के प्रलोभन में नहीं आता है, क्योंकि वह जानता है कि रोगी को मेरी बात माननी चाहिए, रोगी की बात मैं मानूँ यह ठीक नहीं। परिणाम यह होता है कि कैकेयीजी अन्ततोगत्वा भरतजी के साथ चित्रकूट जाती हैं। उनके अन्तःकरण में बड़ी ग्लानि उत्पन्न होती है। उन्हें यह भान हो जाता है कि उनसे बहुत बड़ी भूल हो गयी, बहुत बड़ा अनर्थ हो गया। फिर श्रीभरत के चरित्र के माध्यम से अपनी उस त्रुटि का परिमार्जन करके वे स्वस्थ हो जाती हैं। किन्तु प्रतापभानु अयोग्य ठग वैद्य को पाकर अस्वस्थ हो जाता है।

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