Saturday, 31 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........

ज्ञानियों ने, भक्तों ने और धर्मशास्त्र ने लोभ-ईर्ष्या आदि निकृष्ट वृत्तियों को लिए समाधान देने की चेष्टा की, पर इस समाधान के बावजूद व्यक्ति के मन के ये रोग इतने उलझे हुए हैं कि वह इन समाधानों का भी दुरुपयोग कर बैठता है। जैसे यह जो डर का सिद्धांत है, रोगी मन इसका दुरुपयोग कर सकता है या नहीं ? कर सकता है। कैसे ? यदि वह ईश्वर का डर दूसरों को दिखावे और स्वयं डर से मुक्त रहे, दूसरों को त्याग की शिक्षा दे और अपने जीवन में संग्रह कर ले ; और व्यवहार में ऐसा दिखाई भी देता है। व्यक्ति सिद्धांत की बात तो करता है, पर वह स्वयं के जीवन में उसका दुरुपयोग करता है। इसलिए समस्या के किसी एक पक्ष को लेकर उसका जो समाधान होगा, वह एकांगी होगा। समाधान की समग्रता तो तभी होगी, जब उसमें सभी पक्षों का समन्वय होगा। अगर कहा जाय कि केवल भीतर का सुख ढूढ़ों, बाहर देखो ही मत, तो यह अतिरेक होगा और केवल बाहर के सुख को महत्व दें, भीतर बिल्कुल न देखें तो क्या होगा ? अगर केवल अंतरंग सुख के महत्व दिया गया, तो परिणाम यह होगा कि जीवनयापन के लिए बाह्य आवश्यकता की जो वस्तुएँ हैं, उनका अभाव हो जायेगा और यदि केवल बाह्य सुख को महत्व दिया गया, तो उसका परिणाम होगा कि समाज की बहिरंग दरिद्रता तो मिट जायेगी, पर इस लोभ और ईर्ष्या की वृत्ति की कोई सीमा नहीं रह जायेगी। भौतिक पदार्थों के साथ तो यह समस्या जुड़ी ही रहती है कि जितनी भी हमारी आवश्यकताएँ पूरी होती जाती हैं, लोभ उतना ही बढ़ता जाता है, मन की भूख बढ़ती जाती है। जिनके पास भोग है वे और अधिक का लोभ करते हैं और जिनके पास नहीं है, वे ईर्ष्या करते हैं। यह लोभ और ईर्ष्या दोनों एक दूसरे की पूरक वृत्तियाँ हैं। लोभ से ईर्ष्या उत्पन्न होती है और ईर्ष्यालु व्यक्ति स्वयं लोभी बन जाता है।

Friday, 30 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

निकृष्ट वृत्तियों के लिए या तो धर्म का मार्ग है, या भक्ति अथवा ज्ञान का। ज्ञान का मार्ग क्या है ? यहाँ सुख की परिभाषा बदल दी गयी। कहा गया कि सुख वैभव में नहीं, विषयों में नहीं, वह तो आत्मा में ही उपलब्ध है। वस्तुतः सुख तो अपने भीतर है। बाहर के सुख में तो बँटवारे का झगड़ा है, पर भीतर का जो सुख है, आत्मा का जो सुख है, उसमें बँटवारे का कोई झगड़ा नहीं, कोई छीना-झपटी नहीं। जब हम अपने बाहरी जीवन में संग्रह करते हैं, तो लोभ के कारण अधिक संग्रह कर लेते हैं। उसे देखकर अन्य लोगों को ईर्ष्या होती है और इससे टकराव उत्पन्न होता है। ऐसी स्थिति में संतों ने सुख को अपने भीतर खोजने की, अन्तर के आनन्द को ढूँढने की प्रेरणा दी। संतों ने कहा कि वास्तविक सुख पदार्थ और वैभव में नहीं है, वह तो आत्मसुख में है। इस तरह उन्होंने इस सुख के वितरण का समाधान दिया। जब यह ज्ञात हो गया कि बहिरंग पदार्थों में सुख नहीं है, सुख तो अपने अन्तर में है, तब उस अन्तर के सुख को पाकर बाह्य सुख के लोभ को छोड़ें और अपने संग्रह को उन लोगों में वितरित कर दें, जिन्हें उसकी आवश्यकता है। इससे संग्रहजन्य लोभ-ईर्ष्या आदि की जो वृत्तियाँ हैं और जिनके कारण समाज में टकराव की वृत्ति बनती है, उनका समाधान होगा।

Thursday, 29 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

एक व्यंग्य भरी कथा आपने सुनी होगी। किसी सज्जन ने एक महात्मा को एक शाल ओढ़ा दिया। महात्मा ने कहा कि मुझे नहीं चाहिए। आप इसे वापस ले लीजिए। उस सज्जन ने कहा कि महाराज ! यह शाल मैंने आपको दी थोड़े ही है, वह तो मैंने व्यापार किया है। क्या व्यापार किया है ? बोले कि मैं तो इस एक शाल के बदले कई शाल ले लूँगा। आप जैसे महात्मा को एक शाल दूँगा, तो मुझे अगले जन्म में इसका हजार गुना मिलेगा। महात्माजी भी बड़े विनोदी थे, उन्होंने शाल उतारकर कहा कि भई ! एक तो अभी ले जाओ। बाकी नौ सौ निन्यानवे अगले जन्म में ले लेना। इस तरह लोभ की वृत्ति से भी व्यक्ति दान में प्रवृत्त होता है। यद्यपि यह कोई बहुत ऊँची वृत्ति नहीं है, पर शास्त्र तो हर सोपान पर निकृष्ट वृत्तियों का निवारण कर उच्चतर और उच्चतम सोपानों तक व्यक्ति को उठाने के लिये प्रयत्नशील है।

Wednesday, 28 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

सुग्रीव के मन में क्रमशः एक महान परिवर्तन आता है, अंगद के प्रति उनके मन में उदार वृत्ति का उदय होता है और भय के कारण वे भोगों से विरत हो पाते हैं। तो धर्मशास्त्र में नरक के भय से और भक्ति में भगवान के भय से व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन आता है, स्वार्थपरता और भोग की वृत्ति नियंत्रित होती है। मृत्यु का भय व्यक्ति के संग्रह की वृत्ति को नियंत्रित करता है। व्यक्ति चाहे जितना संग्रह करे, मृत्यु के बाद सब छूट जाता है। अगर सही अर्थों में यह ईश्वर और मृत्यु का भय व्यक्ति के जीवन में आ जाय तो वह समझने लग जाता है कि जीवन में केवल भोग ही नहीं, त्याग की भी अपेक्षा है, केवल लोभ ही नहीं, दान की भी अपेक्षा है। और इसी प्रकार से धर्म में प्रलोभन की बात कही गयी। उसमें कहा गया कि व्यक्ति जो कुछ यहाँ दूसरों को देता है, वही कई गुना होकर उसे स्वर्ग में और अगले कई जन्मों में मिलता रहता है। इसका अभिप्राय यह है कि निरन्तर अपने स्वार्थ का ही चिन्तन करने वाला भोगी व्यक्ति, त्याग की दिशा में स्वयं कभी प्रवृत्त नहीं होता और त्याग के बिना पूर्ण सुख-शांति और जीवन की सार्थकता वह प्राप्त नहीं कर सकता।

Tuesday, 27 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

भगवान लक्ष्मणजी से कहते हैं कि मेरे सखा सुग्रीव को भय दिखाकर यहाँ ले आओ और लक्ष्मणजी यही करते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि कभी-कभी जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु को सहजता से नहीं छोड़ पाता, भोग और वासनाओं को नहीं छोड़ पाता, भय एक ऐसी वृत्ति है जिससे सब छुड़ाया जा सकता है। यह बात शरीर के रोगों के संदर्भ में भी दिखाई देती है और मन के रोगों के संदर्भ में भी। शरीर के रोगों में तो डराने वाले ये डॉक्टर और वैद्य हैं, अगर कह दिया कि नमक खाओगे तो मर जाओगे। अब बेचारा मरीज, जो नमक नहीं छोड़ पा रहा था, मृत्यु के डर से उसका नमक खाना छूट गया। इस तरह भय की भी सार्थकता है। इस संदर्भ में एक बात पर विचार करके देखें। जैसे मृत्यु या रोग के भय से हम कुपथ्य छोड़ देते हैं, उसी तरह अगर ईश्वर से डरकर हम पाप और असत्कर्म छोड़ दें, तो डर की इससे अच्छी सार्थकता और क्या होगी ? और इस प्रसंग में हुआ भी यही। सुग्रीव डर गये। इस डर का परिणाम यह हुआ कि वे पुनः लौटकर भगवान के चरणों में आ गये और सच्चे अर्थों में उन्होंने जनकनन्दिनी सीताजी का पता लगाया और इतना ही नहीं, अंगद के प्रति भी उन्होंने अत्यंत उदारता का परिचय दिया। भगवान जैसा चाहते थे, आगे चलकर सुग्रीव के चरित्र का वैसा ही विकास हुआ और उनके जीवन में सामंजस्य आया।

Monday, 26 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

सुग्रीव जब राज्य पाकर भोगों में लिप्त होकर भगवान को भूल गये, तब भगवान राम ने लक्ष्मणजी से कहा कि सुग्रीव पहले से डरा हुआ था, इसलिए मेरी शरण में आया और जब मैंने उसका भय दूर कर दिया, तो उलटा वह मुझे ही भूल गया। तुम जाओ, लेकिन उसे मारने की आवश्यकता नहीं है, बस उसमें फिर से थोड़ा भय उत्पन्न कर दो। लक्ष्मणजी उठकर बोले कि मैं अभी उसे डरा देता हूँ। यह तो मेरा प्रिय कार्य है। मैं स्वयं आपसे डरता हूँ और चाहता हूँ कि जीव भी आपसे निरन्तर डरता रहे। भगवान ने तुरन्त लक्ष्मणजी का हाथ पकड़ लिया और धीरे से बोले कि देखो ! ध्यान रखना ! उसमें दो बड़ी दुर्बलताएँ हैं, एक तो वह डरपोक है और दूसरे भगोड़ा। उसे डराना, पर देखना कि कहीं वह डरकर भाग न जाय। उसे डराकर यहीं ले आना। पहले तो वह संसार से डरकर भागा हुआ मेरे पास आया, यह तो डरकर भागने की सार्थकता है, पर अब कहीं ऐसा न हो कि मुझसे डरकर वह संसार की ओर भाग जाय। यह तो डर का दुरुपयोग हो जायेगा। इसलिए तुम डर का सदुपयोग करना।

Sunday, 25 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................

भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कामकाज और रामकाज का श्रेष्ठतम सूत्र सुग्रीव को दिया, पर सुग्रीव उसे पूरी तरह से ह्रदयंगम नहीं कर पाये। वे राज्य पाकर कामकाज में और उससे भी अधिक भोगों में डूब जाते हैं। भगवान को वे भूल गये, कई दिनों तक भगवान से मिलने ही नहीं आये। कभी याद आने पर वे अपने आपको यह सोचकर भुलावा देते रहे कि भगवान ने सीताजी का पता लगाने अवश्य कहा है, पर इसमें उन्होंने समय का कोई बंधन तो नहीं लगाया है। हम लोग भी प्रायः यही सोचते हैं कि भक्ति और भगवान की बात फिर कभी कर लेंगे, अभी जल्दी क्या है ? और तब भगवान किसको याद करते हैं ? पहले तो अपने बाण की याद करते हैं। कहते हैं कि लक्ष्मण ! मैंने सोचा है कि जिस बाण से मैंने बालि के ऊपर प्रहार किया था, उसी बाण का प्रहार मैं सुग्रीव पर भी करूँगा। बड़ी विचित्र गुत्थी है। सीधे कह सकते थे कि मैं सुग्रीव को मारूँगा। जिस बाण से बालि को मारा, उसी बाण से सुग्रीव को मारूँगा यह कहने की क्या आवश्यकता थी ? भगवान का तात्पर्य यह था कि मेरे पास दो रोगी आये थे। एक को मैंने मीठी दवा दी और दूसरे को कड़वी। राज्य देकर मैंने सुग्रीव को मीठी दवा और बालि के छाती पर बाण चलाकर उसे कड़वी दवा दी, लेकिन बड़ी विचित्र बात है, जिसे मैंने मीठी दवा दी, वह तो फिर रोगी हो गया और जिसे कड़वी दवा दी, वह निरभिमान होकर मेरे धाम में पहुँच गया। तो लगता है कि कड़वी दवा में कुछ अधिक चमत्कार है। इसलिए उसी दवा का प्रयोग जरा सुग्रीव पर भी करके देखें।

Saturday, 24 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

राज्य पाकर सुग्रीव जब पूछते हैं कि अब मेरे लिए क्या आदेश है ? तब श्रीराम जो कहते हैं, वह बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र है और वह केवल सुग्रीव के ही संदर्भ में नहीं, बल्कि हमारे, आपके एवं सबके लिए बड़े महत्व का है। वह सूत्र क्या है ? हमारे जीवन में एक प्रश्न आता है कि हम अपना कामकाज करें कि रामकाज करें ? संसार का व्यवहार देखें या भक्ति करें ? तो भगवान राम एक सूत्र देते हैं जिसमें कामकाज और रामकाज का सुन्दर सामंजस्य है। उन्होंने कहा कि जाओ ! राज्य चलाओ !! यह राज्य चलाना तो कामकाज है, पर साथ है उन्होंने यह भी कह दिया कि इस कामकाज में व्यस्त होकर रामकाज को न भूल जाना, याद रखना। जनकनन्दिनी सीताजी का पता लगाना है। अभिप्राय यह है कि भेदरहित होकर व्यवहार का निर्वाह करते हुए, इस सत्य को अच्छी तरह से समझकर निरन्तर ध्यान में रखें कि भक्ति और भगवान को पाना ही जीवन का लक्ष्य है। इसके बिना जीवन किसी भी तरह पूर्ण नहीं होगा।

Friday, 23 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

भगवान राम ने सुग्रीव को राज्य तो दिया, पर उनके चरित्र का दर्शन क्या है ? परम्परा यह है कि राजा के पुत्र को ही राज्य मिलता है, लेकिन भगवान राम को यह परम्परा स्वीकार नहीं है। उन्होंने राजा सुग्रीव को बनाया और उत्तराधिकारी का पद अंगद को दिया, सुग्रीव के बेटे को नहीं। यही सुन्दर सामंजस्य है। राज्य पाकर सुग्रीव जब पूछते हैं कि अब मेरे लिए क्या आदेश है ? तब भगवान ने आदेश दिया कि जाओ ! राज्य चलाओ, लेकिन राज्य तुम अकेले, अपनी इच्छा से मत चलाना। तो कैसे चलाना - याद रखना ! बालि ने यह भूल की थी, उसने भाई और बेटे में भेद किया था। बालि के चरित्र में यह दुर्बलता थी। मान लीजिए ! बालि के मंत्रियों ने सुग्रीव के स्थान पर अंगद को सिंहासन पर बिठा दिया होता और बालि लौटकर आते, तो क्या वे अंगद से भी वही व्यवहार करते, जो उन्होंने सुग्रीव के साथ किया ? बिल्कुल नहीं। तब तो उन्हें संतोष हो जाता कि चलो, कोई बात नहीं, मेरा बेटा ही तो सिंहासन पर बैठा हुआ है, पर उसने भाई और बेटे में भेद किया। यह भेदवृत्ति बालि के चरित्र की दुर्बलता है, जो उसके परिवार में अशांति और कलह की सृष्टि करती है और यही हमारे और आपके जीवन में भी दिखाई देती है और उसका परिणाम भी हम देख रहे हैं। भगवान श्री राघवेन्द्र कामकाज का सूत्र देते हुए सुग्रीव से कह देते हैं - सुग्रीव ! इस बात को तुम अच्छी तरह याद रखना कि राज्य तुम अकेले नहीं चलाओगे ! बालि ने जो भूल की उसे तुम दुहराना मत ! अंगद के साथ मिलकर, उसकी सलाह लेकर, दोनों एक मत होकर राज्य चलाना। यही मेरा आदेश है।

Thursday, 22 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

ईश्वर परिणाम में सम है, पर व्यवहार में भक्तों का पक्ष लेते हुए दिखाई देता है। बालि और सुग्रीव के संदर्भ में भी यही बात है। भगवान भक्त का अर्थात सुग्रीव का पक्ष लेते हैं और बालि का वध करते हैं, पर अगर परिणाम की दृष्टि से देखें तो गोस्वामीजी कहते हैं कि परिणाम दोनों का समान है। कैसे ? यहाँ पर भगवान की बड़ी विचित्र भूमिका है। दो भाइयों बालि और सुग्रीव के बीच झगड़ा है। अब इसमें भगवान राम की भूमिका क्या है ? वे किष्किन्धा का राज्य बालि से छीनकर सुग्रीव को दे देते हैं। और बालि को ? - राम बालि निज धाम पठावा। - भगवान राम ने बालि को अपना धाम दे दिया। व्यवहार में पक्षपात दिखाई देते हुए भी, एक के गले में माला और दूसरे के छाती पर प्रहार दिखाई देते हुए भी, परिणाम दोनों के जीवन में समान है। एक को मीठी दवा और एक को कड़वी दवा, पर परिणाम की दृष्टि से दोनों के प्रति कल्याण की भावना है। सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य प्राप्त होता है, तो बालि को अपना धाम प्रदान कर वे पक्षपात और समता दोनों का निर्वाह करते हैं।

Wednesday, 21 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

भगवान श्रीराम बालि का वध करते हैं। यह प्रसंग अपने आप में बड़ा विचित्र है, पर हम विचार करके देखेंगे कि इसके पीछे दर्शन क्या है ? भगवान ने सुग्रीव का पक्ष लिया और बालि को दण्ड दिया। यहाँ पर उनके चरित्र का दर्शन बड़े सांकेतिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रश्न उठता है कि भगवान को हम किस रूप में देखें ? वेदांत की मान्यता है कि ब्रह्म सम है और भक्तों की मान्यता है कि भगवान पक्षपाती है, अब दोनों में सही बात कौन-सी है ? ईश्वर सम है कि विषम ? इसका सांकेतिक उत्तर यह है कि एक साथ दोनों की रक्षा करना ही ईश्वर की विलक्षणता है। एक दृष्टांत के द्वारा हम इसे आपके सामने रखते हैं। मान लीजिए एक वैद्य के पास दस रोगी आये हुए हैं। अब वैद्य का कर्तव्य क्या है ? यही है कि वह समस्त रोगियों के प्रति सम हो। समता का एक अर्थ तो यह हुआ कि जितने रोगी आये हुए हैं उन सबको एक ही दवा दे दें, एक ही पथ्य बता दें और कह दें कि हम तो सब के प्रति सम हैं। अगर चिकित्सक ऐसी समता दिखाने लगें, तो बेचारे रोगियों की क्या दशा होगी ? इसे समझना कठिन नहीं है, तो समता का अभिप्राय है परिणाम में सम होना, व्यवहार में नहीं। व्यवहार में जिसको कड़वी दवा दी, उसे देखकर लगेगा कि उसके प्रति द्वेष भाव है, पर दोनों का परिणाम क्या हुआ ? यही महत्वपूर्ण है। व्यवहार में एक को मीठी और दूसरे को कड़वी दवा दी गयी, पर उसके पीछे वैद्य की भावना यही है कि परिणाम दोनों का सम हो। दोनों स्वस्थ हो जायँ।

Tuesday, 20 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

ईश्वर के पद-चिह्नों का संरक्षण अर्थात मर्यादा का संरक्षण। इसका अभिप्राय क्या है ? मर्यादा माने क्या ? भगवान श्रीराम को सूचना दी गयी कि कल आप अयोध्या के राजसिंहासन पर बैंठेंगे और उस सूचना को सुनकर भगवान राम के मन में जो प्रतिक्रिया हुई, वही भगवान राम की बनायी हुई वह रेखा, वह पदचिह्न है, जिसे उन्होंने अपने व्यवहार और चरित्र के माध्यम से समाज के समक्ष प्रकट किया। व्यक्ति राज्य और सत्ता पाने के लिए निरन्तर व्यग्र रहता है। इसके लिए अन्याय और अधर्म करने में भी वह रंचमात्र संकोच नहीं करता, पर राज्य पाने की सूचना पाकर भगवान राम के मन में जो प्रतिक्रिया हुई, यही भगवान राम के चरित्र का दर्शन है। समाचार सुनकर प्रभु उदास हो गये। यद्यपि राम कुछ बड़े हैं, पर सोचते हैं कि हम चारों भाइयों का जन्म एक साथ हुआ, साथ खेले, उपनयन और विवाह भी एक साथ हुआ, उदास क्यों हो गये ? भगवान राम उदास होकर सोचने लगे कि इस पवित्र सूर्यवंश में यही परम्परा बड़ी बुरी है कि छोटे को छोड़कर बड़े को राज्य दिया जाता है। मानस की इस पंक्ति का तात्पर्य यह नहीं है कि इसे पढ़कर लोग गदगद हो जायँ, यह सोचकर आँखों में आँसू आ जायँ कि भगवान राम दूसरों का कितना ध्यान रखते हैं। गोस्वामीजी तुरन्त कहते हैं कि भगवान राम के ह्रदय में यह जो भावना है, उससे प्रेरित होकर यदि हम अपने से छोटों के प्रति ध्यान रखें, तो हम सही अर्थों में भगवान राम के पदचिह्नों को बचाकर उन्हें ठीक-ठीक अपने जीवन में स्वीकार कर पायेंगे। इस प्रसंग को पढ़ने के बाद भी अगर हममें दूसरों के सुख-साधनों को छीनकर स्वयं सुखी होने की वृत्ति बनी रही, तब तो हम भगवान के पदचिह्नों को नहीं बचा पाये। इसे पढ़ने के बाद तो परिणाम यह होना चाहिए- हमारी स्वार्थपरता, कुटिलता और सठता की वृत्ति दूर हो जाय।

Monday, 19 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

पहला सूत्र है आगे राम और दूसरा है सभीता। जनकनन्दिनी सीताजी और लक्ष्मण, दोनों भगवान राम के पीछे चलते हैं और दोनों अत्यंत डरे हुए हैं। यह बड़ी विलक्षणता है। जनकनन्दिनी श्रीसीता का श्रीराम से डरना तो स्वाभाविक लगता है। वे भक्ति हैं। वे चलती हुई एक-एक पग डरती हुई रखती हैं कि कहीं ऐसा न हो कि श्रीराम के चरणचिह्नों पर मेरे पाँव पड़ जायँ और वे मिट जायँ, पर लक्ष्मणजी तो दोहरे डरे हुए हैं। सीताजी तो केवल श्रीराम के चरणचिह्नों को बचाकर चल रही हैं, लेकिन लक्ष्मणजी के सामने तो दो के चरणचिह्न हैं और उन्हें उन दोनों को बचाने की चिन्ता लगी है। वे दोनों को बचाते हुए सभीत और सजग भाव से चल रहे हैं। सीताजी महाशक्ति हैं और लक्ष्मणजी शेष हैं अर्थात कालतत्व। ये दोनों भगवान राम से क्यों डरते हैं ? एक बार भगवान श्रीराम ने लक्ष्मणजी से पूछ दिया - लक्ष्मण ! तुम तो शेष हो, अनन्त काल हो, तुम मुझसे क्यों डरते हो ? लक्ष्मणजी ने कहा कि महाराज ! मैं चाहता हूँ कि लोग समझ लें कि मैं अनन्त शेष होकर भी ईश्वर से डरता हूँ। जब मुझे ही ईश्वर से डर लगता है, तो आप सामान्य लोग ईश्वर से निर्भय रहें, यह मर्यादा का संरक्षण नहीं है। ईश्वर के पद-चिह्नों का संरक्षण अर्थात मर्यादा का संरक्षण।

Sunday, 18 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

........कल से आगे..........
लक्ष्मण और इन्द्र के संदर्भ में बड़ी प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग किया गया है। भगवान राम विष्णु के अवतार हैं। लक्ष्मणजी ने उन्हें बड़े भाई के रूप में देखा और उन्हें आगे करके चल रहे हैं, परन्तु भगवान ने जब इन्द्र से पूछा तो उन्होंने कहा कि आप मेरे छोटे भाई बनिए ! क्यों ? इन्द्र स्वर्ग का राजा है, भोगी है और लक्ष्मणजी मूर्तिमान वैराग्य हैं। इसका तात्त्विक तात्पर्य यह है कि जो वैराग्यवान है, वह भगवान के पीछे चलता है, पर जो भोगी है, वह तो ईश्वर को पीछे ही रखता है। उसे यही चिन्ता रहती है कि भगवान यदि बड़े भाई बन गये तो उनकी बात माननी पड़ेगी और छोटे भाई बने रहेंगे तो उन्हें हमारे पीछे आना पड़ेगा, हम जो कहेंगे उसे मानना पड़ेगा। हम ईश्वर की बात नहीं मानना चाहते, ईश्वर के पीछे चलना नहीं चाहते। हम तो ईश्वर को अपने छोटे भाई की तरह पीछे-पीछे आने के लिए, हम जो कहें उसे मानने के लिए कहते हैं।

Saturday, 17 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................

रामचरितमानस में प्रसंग आता है कि तीन यात्री वन के मार्ग में चले जा रहे हैं - भगवान श्रीराम, जनकनन्दिनी श्रीसीताजी और श्री लक्ष्मण। गोस्वामीजी इन तीनों यात्रियों का वर्णन करने के बाद कहते हैं कि जिसने भी इन्हें चलते हुए देखा है, या इन्हें ह्रदय में धारण किया है, वह व्यक्ति संसार - पथ को बड़ी सरलता से पार कर लेता है। इन तीनों यात्रियों के क्रम में तीन संकेत हैं। पहला संकेत है - आगे राम और इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि हम जीवनपथ में हम अकेले न चलें, अपितु ईश्वर को साथ लेकर चलें। अधिकांश व्यक्ति कह सकते हैं कि हम तो जब भी यात्रा प्रारंभ करते हैं, ईश्वर का स्मरण कर लेते हैं। हम तो निरन्तर ईश्वर को साथ लेकर चलते हैं। गोस्वामीजी तुरन्त एक शब्द कहकर सावधान कर देते हैं- आगे राम। ईश्वर को साथ लेकर चलते हैं पर आगे या पीछे ? इसका अभिप्राय यह है कि हम ईश्वर से यही कहते हैं कि हमारा जहाँ स्वार्थ है, जहाँ वासना है, वहाँ हम जा रहे हैं, आप भी हमारे पीछे-पीछे आइये। आगे-आगे चलकर सही दिशा हम बतायेंगे, आप हमारा अनुगमन करें। गोस्वामीजी कहते हैं - पीछे नहीं, आगे राम। कोई पूछ सकता है कि ईश्वर तो साथ में हैं, फिर आगे हैं या पीछे, इससे क्या फर्क पड़ता है ? नहीं, इसमें बहुत बड़ा अन्तर है।
            ......,आगे कल.......

Friday, 16 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

लोभ और ईर्ष्या एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान है। अब इसका समाधान क्या है ? इस समस्या के समाधान के लिए कई बातें सोची गयीं, वेदांत ने प्रयास किया, भक्ति और कर्मशास्त्र के द्वारा प्रयत्न हुआ तथा शासन भी इसके समाधान की चेष्टा करता है। इस लोभ और ईर्ष्या के समाधान के लिए शासनतंत्र के दण्ड का भय रहे तो उनमें लोभ और संग्रह की वृत्ति न आकर दान की वृत्ति आयेगी। कर इत्यादि के रूप में शासन इसे नियंत्रित करने की चेष्टा करता है। इस तरह भय की वृत्ति भी एक उपाय है। धर्म में भी उस भय का प्रयोग किया गया, पर दूसरे रूप में और उसके साथ प्रलोभन भी जोड़ दिया गया। धर्म में एक ओर तो यह भय दिखाया गया कि अन्याय तथा भ्रष्टाचार के द्वारा तुम जो कुछ भी संचय करोगे। वह सब अन्त में छोड़कर खाली हाथ जाना होगा। इस प्रकार धर्म में मृत्यु और पुनर्जन्म का भय दिखाया गया और भक्तों ने भगवान का भय दिखाया। अतः भय की वृत्ति के द्वारा भी भ्रष्टाचार से बचा जा सकता है।

Thursday, 15 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

आजकल भ्रष्टाचार की आलोचना बड़ी व्यापक है। हर मंच में, समाचार पत्रों में, जहाँ देखिए वहीं भ्रष्टाचार की बड़ी चर्चा है, लेकिन बड़ी विचित्र बात है कि भ्रष्टाचार पर इतना विचार किया जाता है, इतना कहा जाता है, पर भ्रष्टाचार मिटता क्यों नहीं ? इसका रहस्य यह है कि वस्तुतः झगड़ा अगर भ्रष्टाचार मिटाने का हो तो भ्रष्टाचार मिट जाए, पर यह झगड़ा भ्रष्टाचार मिटाने का नहीं, भ्रष्टाचार के बँटवारे का है। असल में हम जो झगड़ते हैं, वह इस बात पर कि इस भ्रष्टाचार में हमें कम भाग मिल रहा है और दूसरे अधिक ले रहे हैं। ये सारी वृत्तियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और इसके मूल में लोभ और ईर्ष्या है। प्रत्येक व्यक्ति में ये विद्यमान है। लोभ के कारण वह सारी सुख-सुविधा की वस्तुएँ अपने लिए एकत्र कर लेना चाहता है और ईर्ष्या के कारण वह दूसरों का सुख एवं समृद्धि देखकर असंतुष्ट होता है।

Wednesday, 14 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

लोभ और ईर्ष्या की वृत्ति में कितना निकट का संबंध है, इस ओर मैं आपका ध्यान आकृष्ट करूँगा। अगर व्यक्ति के मन में निर्विवाद रूप से किसी वस्तु की माँग है तो वह है सुख की माँग। यद्यपि सुख की व्याख्या को लेकर मतभेद है, क्योंकि सुख की व्याख्या अलग-अलग रूपों में की जाती है, लेकिन अधिकांश व्यक्ति भौतिक पदार्थों की उपलब्धि को ही सुख के रूप में देखते हैं और समाज में जो यह इतनी छीना-झपटी है, वह सुख को लेकर है। प्रत्येक व्यक्ति को एक ही बात की चिन्ता बनी रहती है कि सुख की अधिक से अधिक सामग्री हमारे पास एकत्रित हो जाय और दूसरों के पास हमसे अधिक न होने पाये। यह सुख की सामग्री एकत्रित करना लोभ है और दूसरे के पास मुझसे अधिक सुख न होने पाये यह ईर्ष्या है। ये दोनों वृत्तियाँ एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई हैं। यह जो व्यक्ति, परिवार और समाज में इतनी आपा-धापी, झगड़ा और संघर्ष है, सब सुख की वस्तुओं के बँटवारे को ही लेकर है।

Tuesday, 13 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

शरीर के संदर्भ में जैसे पेट के रोगों का संबंध बहुधा पित्त से होता है और श्वासतंत्र से संबंधित रोगों का कफ से। इसी प्रकार मन के संदर्भ में क्रोध की तुलना गोस्वामीजी पित्त से करते हैं - अहंकार होने के कारण क्रोध आता है। क्रोध अहंकार की ही अभिव्यक्ति है। क्रोध क्यों आता है ? जैसे पित्त की विकृति से पेट रूग्ण हो जाता है, भोजन का पचना कठिन हो जाता है इसी प्रकार अहंकार को चोट पहुँचने पर क्रोध आता है। क्रोध और अहंकार बड़ी गहराई से जुड़े हुए हैं। इसी प्रकार श्वासतंत्र से जुड़ा हुआ है - कफ और अब हम जिस रोग की चर्चा करने जा रहे हैं, वह है राजयक्ष्मा। आपने देखा होगा कि जो यक्ष्मा के रोगी हैं, उन्हें बहुधा कफ निकला करता है और उस कफ में रोग के कीटाणु विद्यमान रहते हैं। उसका ह्रदय उस कफ से आक्रांत रहता है और उससे वह दुखी रहता है। इसे ही गोस्वामीजी मन के संदर्भ में कहते हैं - दूसरों के सुख को देखकर ह्रदय में जलन होना, यही मन की यक्ष्मा है। यह मूलतः लोभ की शाखा का रोग है। जैसे काम के साथ आसक्ति जुड़ी हुई है, कामी व्यक्ति के जीवन में काम के परिणाम स्वरूप आसक्ति का जन्म होगा।  उसी तरह लोभ के साथ ईर्ष्या के साथ ईर्ष्या जुड़ी हुई है। लोभी व्यक्ति ईर्ष्यालु अवश्य होगा। लोभी व्यक्ति में लोभ जितना अधिक होगा, वह ईर्ष्यालु भी उतना ही अधिक होगा।

Monday, 12 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

मोह ही समस्त व्याधियों का मूल है। फिर चाहे वह शरीर की ब्याधि हो या मन की, इसी एक मोह से प्रभावित होती हैं। मन और शरीर को विकृत करने में समान रूप से कारण - यह मोह तीन वस्तुओं को विकृत कर अगणित ब्याधियाँ उत्पन्न करता है, वे शरीर के संदर्भ में वात, पित्त और कफ हैं तथा मन के संदर्भ में काम, क्रोध और लोभ। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में वात, पित्त और कफ विद्यमान है, पर आयुर्वेद में इनके और अधिक सूक्ष्म अध्ययन की दृष्टि से इन्हें पुनः तीन भागों में विभाजित किया गया है। यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में ये तीनों विद्यमान रहते हैं, पर किसी शरीर में वात की प्रधानता होती है, तो किसी में पित्त की और किसी में कफ की। इन तीनों की प्रधानता को दृष्टि में रखकर मनुष्यों का विभाजन किया गया है - वातप्रधान, पित्तप्रधान और कफप्रधान। अब इसी सूत्र को गोस्वामीजी मन के संदर्भ में जोड़ देते हैं। वे कहते हैं कि ठीक शरीर के तत्व की ही भाँति मन में भी काम, क्रोध और लोभ विद्यमान रहते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति के मन में काम की प्रधानता रहती है, किसी में क्रोध की और किसी में लोभ की और यह स्पष्ट दिखाई भी देता है कि व्यक्ति इन तीनों में से किसी एक से ग्रस्त रहता है, घिरा हुआ रहता है।

Sunday, 11 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............,,,,

गोस्वामीजी ने लिखा है -
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।
तिन्ह के पुनि उपजहिं बहु सूला।।
मोह ही समस्त ब्याधियों का मूल है और उससे ही अगणित रोग उत्पन्न होते हैं। यह मोह क्या है ? मोह की व्याख्या की गयी - मोहश्चित्त विषर्यय: - चित्त में विपरीतता की स्थिति उत्पन्न हो जाना - यही मोह की वृत्ति का लक्षण है। यद्यपि मन और शरीर का संदर्भ अलग-अलग है, पर मोह की वृत्ति दोनों संदर्भों में समान रूप से प्रेरक है। शरीर के संदर्भ में स्वस्थ रहने का उपाय हम जानते हैं। स्वस्थता के लिए नियम, संयम और पथ्य आदि सब हम जानते हैं, पर बड़ी विचित्र विडम्बना है कि व्यक्ति पथ्य और कुपथ्य का भेद जानकर भी कुपथ्य को अस्वीकार नहीं कर पाता। कुपथ्य को जानबूझकर ग्रहण कर लेता है। यही मोह की स्थिति है। मन के संदर्भ में भी यही सत्य है कि जिन सच्चाइयों को हम जानते हैं, उनकी भी जानबूझकर अवहेलना करते हैं। इसी मोह की वृत्ति के कारण हमारा मन अस्वस्थ हो जाता है और जीवन में अनेक दुर्गुण-दुर्विचार आ जाते हैं।

Saturday, 10 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

रामचरितमानस के अंत में गरूड़जी द्वारा काकभुशुण्डिजी से सात प्रश्न किये गये। उनमें से सातवें और अन्तिम प्रश्न के उत्तर में काकभुशुण्डिजी ने मानस-रोगों का वर्णन किया तथा उनकी चिकित्सा पध्दति बतायी। उन्होंने यह विश्लेषण आयुर्वेद की पद्धति से किया। आयुर्वेद की मान्यता यह है कि व्यक्ति के शरीर मे रोग चाहे जितने उत्पन्न हों, पर उन सबके मूल में केवल तीन ही वस्तुएँ हैं - कफ, वात एवं पित्त और इन तीनों के मूल में भी प्रेरक वस्तु एक ही है। उसी एक से तीन और उस तीन से न जाने कितने रोग सहस्रों रूपों में सक्रिय हो जाते हैं। इसमें जो एक क्रम है, मानस-रोगों में भी गोस्वामीजी ने उसी क्रम को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि मन में जितने भी विकार हैं, उनके मूल में मोह की वृत्ति ही विद्यमान है। यही मोह की प्रवृत्ति क्रमशः काम, क्रोध एवं लोभ - तीन रूपों में प्रकट होती है और इन्हीं से अगणित मानसिक विकार उत्पन्न होकर मानस जीवन पर शासन करने लग जाते हैं।

Friday, 9 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

भक्तिशास्त्र के अनुसार मन ही व्यक्ति की समस्या है - मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। मन ही केन्द्र है। इसलिए भक्त कहते हैं कि मन का पुनर्निर्माण हो। इसे चाहे रोग कह लीजिए, चाहे राक्षस कह लीजिए, चाहे दुर्गुण-दुर्विचार कह लीजिए और चाहे अवस्था। रामचरितमानस में सभी केन्द्रों का उत्तर दिया गया है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार सभी का समाधान दिया गया है और अन्त में मन के रोगों का विश्लेषण करते हुए यह कहा गया कि आयुर्वेद की पद्धति से जैसे शरीर के रोगों का विश्लेषण किया जाता है तथा उसे मिटाने की चेष्टा की जाती है, उसी तरह से मन के रोगों का भी विश्लेषण करके उसे भिन्न पध्दतियों से मिटाने का प्रयत्न किया जाता है।

Thursday, 8 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

मारीच प्रसंग में गोस्वामीजी गीतावली रामायण में कहते हैं - लखन ललित लिये मृगछाला - लक्ष्मणजी जब लौटे तो उन्होंने मृगचर्म को बगल में दबा रखा था। लंका के सुवेल शैल पर लक्ष्मणजी ने इसी मृगचर्म का आसन बिछाकर भगवान राम को बिठाया। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की समवेत कृपा से निर्मित यह मृगचर्म जिसकी चंचलता मिट चुकी है, जो शान्त और विरक्त है, ऐसे मन पर आसीन होने के बाद ही रावण के विरुद्ध भगवान का युद्ध प्रारंभ होता है और उस युद्ध में रावण का विनाश होता है। यह मानो अन्तःकरण में मन का जो निर्माण है, वहाँ हमारी असमर्थता की स्थिति में भगवान स्वयं आकर हमारी प्रार्थना को स्वीकार करें, बुराइयों को नष्ट करें, यही इस ध्यान का समग्र रहस्य है।

Wednesday, 7 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

सीताजी मृग रूपी मारीच को देखकर कहती हैं कि इस मृग का चमड़ा बड़ा सुन्दर है, और साथ-साथ कह दिया - प्रभु प्रहार करके इसका वध कीजिए। यह कैसी विचित्र माँग है ? पर उनका अभिप्राय क्या है ? प्रभु! आप इसकी चंचलता मिटा दीजिए। जो मन अपनी चंचलता मिटाने में समर्थ नहीं है, उसकी चंचलता आप अपने प्रहार से मिटा दीजिए और तब भगवान श्रीराघवेन्द्र तुरन्त मारीच के पीछे चले। भक्ति ने प्रेरणा दी, ज्ञान मायामृग के पीछे भगा और मन इतना अधिक चंचल है कि भगवान राम ने कठिन बाण से उसे मारा। यह ज्ञान का प्रहार है - माया के ऊपर, ज्ञान का प्रहार मन की चंचलता के ऊपर और अन्त में जो बचा हुआ काम था, वह किसने पूरा किया ? वह लक्ष्मणजी ने पूरा किया। पूरा करने का यह तीसरा कार्य क्या है ? मृग से जब चमड़ा अलग किया जायेगा, रक्त-मांस को अलग कर दिया जायेगा और उसे पूरी तौर से सुखा लिया जायेगा, तब वह चमड़ा आसन के रूप में उपयोग किया जा सकेगा और इसका अभिप्राय क्या है ? जब तक मन में राग का रक्त बना रहेगा तब तक वह भगवान के बैठने योग्य नहीं होगा। उसके राग का रक्त निकाल दिया जाय और उसे पूरी तरह से सुखा दिया जाय, तब वह भगवान के बैठने योग्य होगा। यह भूमिका भगवान ने वैराग्य को, लक्ष्मणजी को सौंपी। भाई! चमड़े से रक्त को अलग करना, उसको सुखाना और राग को मिटाना तुम्हारा काम है।

Tuesday, 6 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................

लंका में सुवेल शैल पर भगवान जिस आसन पर बैठते हैं, इस आसन के निर्माण में तीनों का हाथ है - भगवान राम का, सीताजी का और लक्ष्मणजी का। इसका सांकेतिक तात्पर्य यह है कि यह जो त्रयी है - ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की - उसका एक क्रम है। मन का निर्माण कैसे हुआ ? मारीच सबसे पहले सीताजी के सामने आया। पहले वह श्रीराम के सामने नहीं गया, क्योंकि उसको उनके बाण का पुराना अनुभव था। श्रीराम ने बाण मारकर उसे दूर फेंक दिया था। ज्ञान ने तो वही किया जो उसका स्वभाव है। अब इस समय जरा भक्ति की करुणा का आश्रय लें। भक्ति की कृपालुता का आश्रय लेने से शायद प्रभु मुझे पास बुला लें। भगवान ने मन के दोषों के रूप में मारीच को (महर्षि विश्वामित्रजी के यज्ञ की रक्षा करते समय ) दूर फेंक दिया था और जब मारीच अपने को नकली मृग के रूप में सीताजी के सामने ले जाता है, तब भक्तिदेवी की दृष्टि उस पर पड़ती है और तुरन्त उन्होंने भगवान राम से कहा - एहि मृग कर अति सुन्दर छाला। सीताजी जब मृग की प्रशंसा करने लगीं, तो किसी ने पूछ दिया कि आप सब कुछ जानते हुए भी उस मृग की प्रशंसा कैसे कर रही हैं ? इस पर उन्होंने क्या कहा ? प्रशंसा में उन्होंने यह नहीं कहा कि मृग बड़ा सुन्दर है। उनके शब्द हैं - इस मृग का चमड़ा बड़ा सुन्दर है। इन दोनों उक्तियों में अन्तर है। अभिप्राय यह है कि जब तक यह जीवित है, तब तक सुन्दर नहीं है, परन्तु जब वह मर जायेगा तब सुन्दर है और इसका तात्पर्य यह है कि मन की चंचलता जब तक जीवित है, तब तक वह सुन्दर नहीं है।

Monday, 5 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

लंका में सुवेल शिखर पर लक्ष्मणजी समतल भूमि खोजकर उस पर भगवान के लिए आसन बिछाते हैं। पहले सुन्दर कोमल-कोमल पत्ते बिछाते हैं। पत्तों के ऊपर फूल की पंखुड़ियाँ बिखरते हैं और उसके ऊपर मृगचर्म बिछाते हैं, उसी आसन के ऊपर भगवान राम आसीन हैं। सिंहासन तो धर्म का आसन है, वरासन ज्ञान का आसन है और कुशासन भक्ति का, पर यह मृगचर्म ? यह कौन सा आसन है ? यह जो हमारे-आपके जीवन में बड़ी गहराई से जुड़ा हुआ सत्य है, उसे गोस्वामीजी ने मृगचर्म के माध्यम से प्रकट किया।  यह मृगचर्म कौन सा है ? कहाँ से आया ? वस्तुतः यह मारीच का चमड़ा है जिसे लक्ष्मणजी ने भगवान के लिए बिछाया। मानो भगवान का संकेत यह है कि लंका में रावण ने आसन भले न दिया हो, पर मारीच को भेजा तो उसी ने था। तो उससे जो आसन बना, लंका में उसी आसन पर भगवान बैठे हैं। यह मारीच कौन है ? मारीच वस्तुतः व्यक्ति के घोर तमोमय चंचल मन का प्रतीक है, जो रावण के शासन में रहता है। ऐसा मन जो मोह के वशीभूत हो। मारीच को मारकर उसका आसन स्वयं ईश्वर को बनाना पड़ा। आज उसी आसन पर वे बैठे हुए हैं। इसका अभिप्राय यह है कि जो लोग अपने अन्तःकरण को ईश्वर के आसीन होने योग्य बना सकें, वे तो बना लें। लेकिन कभी किसी को अनुभव हो कि हम अपने अन्तर्मन को इस योग्य नहीं बना पा रहे हैं, उसमें अयोध्या के सिंहासन, मिथिला के वरासन और चित्रकूट के कुशासन जैसे निर्माण की क्षमता हममें नहीं है, तो उनके लिए प्रार्थना ही उपाय है, शरणागति ही उपाय है। उनसे प्रार्थना करें कि आज हम इस परिस्थिति में आ गये हैं कि हम चाहकर भी स्वयं को बदलने में समर्थ नहीं हैं। आप आकर स्वयं अपना आसन बनायें।

Sunday, 4 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

........कल से आगे......
लंका में भगवान के लिए लक्ष्मणजी ने स्थान का चुनाव किया एक शिखर पर, जहाँ पर कुछ समतल भूमि दिखाई पड़ी। बड़ी सांकेतिक भाषा है। जहाँ पर शिखर है वहाँ पर समता ढूँढना तो कठिन ही है, लेकिन लक्ष्मणजी ढूँढ लेते हैं। यही नहीं, लंका कितनी भी बुरी क्यों न हो, कहीं न कहीं कोई कोना अच्छा मिल ही जाता है। प्रत्येक व्यक्ति की यही स्थिति है। भले ही हमारे अन्तर्जीवन पर रावण का शासन हो, दुर्गुणों का शासन हो, पर ऐसा नहीं हो सकता कि जीवन का कोई कोना खाली न पड़ा हो। जिन तीन शिखरों पर लंका बसी हुई है, वे हैं - सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के शिखर। रजोगुण और तमोगुण के शिखरों पर रावण सक्रिय है और सत्व का शिखर खाली पड़ा है। रावण ने इसे व्यर्थ समझकर छोड़ रखा है। इसका अभिप्राय यह है कि रावण शासित जीवन या तो रजोगुण द्वारा संचालित है अथवा तमोगुण द्वारा। सत्व भी वहाँ पर है, भले ही वह सक्रिय न हो। उस सत्य में लक्ष्मणजी कहीं न कहीं समतल भूमि खोज लेते हैं और उस पर भगवान के लिए आसन बिछाते हैं।

Saturday, 3 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

भगवान राम को जब कोई बुलाता है तो उसके लिए आसन की व्यवस्था करता है। अयोध्या में भगवान का आसन है - सिंहासन। जब रामराज्य बनता है तब भगवान सिंहासन पर बैठते हैं। मिथिला में महाराज जनक ने उन्हें वरासन पर बिठाया और चित्रकूट में जनकनन्दिनी सीताजी ने वट वृक्ष की छाया में बड़ी सुन्दर वेदी बनाकर उस पर कुशासन बिछाया, जिस पर भगवान राम विराजमान हैं। यह बड़ी सांकेतिक भाषा है। सिंहासन धर्म का आसन है। यहीं से रामराज्य का संचालन होता है। वरासन ज्ञान का आसन है। महाराज जनक महान तत्वज्ञ हैं, उनके लिए ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है, सर्वश्रेष्ठ ही वरणीय है और चित्रकूट में जो वेदी है वह साक्षात भक्तिदेवी की बनायी हुई है। ये तीन स्थानों पर ये तीन आसन हैं। लेकिन लंका वाला आसन ! न सिंहासन, न वरासन और न कुशासन।  यहाँ तो भगवान को लक्ष्मण के कान में कहना पड़ा कि लंका चलना है, आसन भी साथ ही ले चलें। वहाँ हमें कोई आसन देने वाला नहीं है। गोस्वामीजी ने यहाँ पर साधना की एक बड़ी ही मार्मिक और तात्विक व्याख्या की है -
              ......आगे कल ......

Thursday, 1 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

.......कल से आगे.......
जब भगवान राम ने गोस्वामीजी से पूछा कि सारी पद्धतियों में, सारे रूपों में हमारा कौन सा रूप तुम्हें सबसे अधिक प्रिय है। तो गोस्वामीजी ने धीरे से अपना पक्षपात प्रकट कर दिया। भगवान राम जब लंका में आकर सुवेल शैल पर आसीन हुए तो गोस्वामीजी ने उनका एक चित्र प्रस्तुत किया और उसके साथ अपना पक्षपात जोड़ दिया। वे कहने लगे -
एहि विधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।
धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लवलीन।।
धन्य हैं वे लोग, जो भगवान के इस ध्यान में डूबे हुए हैं। गोस्वामीजी से भगवान पूछ सकते हैं कि मिथिला की इतनी मधुर झाँकी, चित्रकूट का इतना सुन्दर वेश, उनके साथ तुमने यह शब्द नहीं जोड़ा, इस लंका की झाँकी में ऐसा कौन सा आकर्षण है जो तुमने ऐसा कह दिया ? गोस्वामीजी ने कहा कि महाराज ! मेरे सामने एक ही समस्या है। क्या ? अगर अयोध्या की झाँकी ह्रदय में लाना चाहें तो पहले ह्रदय को अयोध्या बनाना पड़ेगा। अगर मिथिला की झाँकी, दूल्हे के रूप में आपको लाना चाहें, तो ह्रदय को पहले मिथिला बनाना पड़ेगा। अगर चित्रकूट की झाँकी लाना चाहें, तो उसे चित्रकूट बनाना तो कठिन है, पर जब से मैंने सुना है कि आप लंका में भी आ सकते हैं, तो ह्रदय को लंका बनाना नहीं है, वह तो बनी-बनायी पड़ी है, इसलिए मैं सोचता हूँ कि हमारे लिए यही झाँकी अच्छी है।