Thursday, 15 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

आजकल भ्रष्टाचार की आलोचना बड़ी व्यापक है। हर मंच में, समाचार पत्रों में, जहाँ देखिए वहीं भ्रष्टाचार की बड़ी चर्चा है, लेकिन बड़ी विचित्र बात है कि भ्रष्टाचार पर इतना विचार किया जाता है, इतना कहा जाता है, पर भ्रष्टाचार मिटता क्यों नहीं ? इसका रहस्य यह है कि वस्तुतः झगड़ा अगर भ्रष्टाचार मिटाने का हो तो भ्रष्टाचार मिट जाए, पर यह झगड़ा भ्रष्टाचार मिटाने का नहीं, भ्रष्टाचार के बँटवारे का है। असल में हम जो झगड़ते हैं, वह इस बात पर कि इस भ्रष्टाचार में हमें कम भाग मिल रहा है और दूसरे अधिक ले रहे हैं। ये सारी वृत्तियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और इसके मूल में लोभ और ईर्ष्या है। प्रत्येक व्यक्ति में ये विद्यमान है। लोभ के कारण वह सारी सुख-सुविधा की वस्तुएँ अपने लिए एकत्र कर लेना चाहता है और ईर्ष्या के कारण वह दूसरों का सुख एवं समृद्धि देखकर असंतुष्ट होता है।

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