लोभ और ईर्ष्या की वृत्ति में कितना निकट का संबंध है, इस ओर मैं आपका ध्यान आकृष्ट करूँगा। अगर व्यक्ति के मन में निर्विवाद रूप से किसी वस्तु की माँग है तो वह है सुख की माँग। यद्यपि सुख की व्याख्या को लेकर मतभेद है, क्योंकि सुख की व्याख्या अलग-अलग रूपों में की जाती है, लेकिन अधिकांश व्यक्ति भौतिक पदार्थों की उपलब्धि को ही सुख के रूप में देखते हैं और समाज में जो यह इतनी छीना-झपटी है, वह सुख को लेकर है। प्रत्येक व्यक्ति को एक ही बात की चिन्ता बनी रहती है कि सुख की अधिक से अधिक सामग्री हमारे पास एकत्रित हो जाय और दूसरों के पास हमसे अधिक न होने पाये। यह सुख की सामग्री एकत्रित करना लोभ है और दूसरे के पास मुझसे अधिक सुख न होने पाये यह ईर्ष्या है। ये दोनों वृत्तियाँ एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई हैं। यह जो व्यक्ति, परिवार और समाज में इतनी आपा-धापी, झगड़ा और संघर्ष है, सब सुख की वस्तुओं के बँटवारे को ही लेकर है।
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