राज्य पाकर सुग्रीव जब पूछते हैं कि अब मेरे लिए क्या आदेश है ? तब श्रीराम जो कहते हैं, वह बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र है और वह केवल सुग्रीव के ही संदर्भ में नहीं, बल्कि हमारे, आपके एवं सबके लिए बड़े महत्व का है। वह सूत्र क्या है ? हमारे जीवन में एक प्रश्न आता है कि हम अपना कामकाज करें कि रामकाज करें ? संसार का व्यवहार देखें या भक्ति करें ? तो भगवान राम एक सूत्र देते हैं जिसमें कामकाज और रामकाज का सुन्दर सामंजस्य है। उन्होंने कहा कि जाओ ! राज्य चलाओ !! यह राज्य चलाना तो कामकाज है, पर साथ है उन्होंने यह भी कह दिया कि इस कामकाज में व्यस्त होकर रामकाज को न भूल जाना, याद रखना। जनकनन्दिनी सीताजी का पता लगाना है। अभिप्राय यह है कि भेदरहित होकर व्यवहार का निर्वाह करते हुए, इस सत्य को अच्छी तरह से समझकर निरन्तर ध्यान में रखें कि भक्ति और भगवान को पाना ही जीवन का लक्ष्य है। इसके बिना जीवन किसी भी तरह पूर्ण नहीं होगा।
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