भगवान श्रीराम बालि का वध करते हैं। यह प्रसंग अपने आप में बड़ा विचित्र है, पर हम विचार करके देखेंगे कि इसके पीछे दर्शन क्या है ? भगवान ने सुग्रीव का पक्ष लिया और बालि को दण्ड दिया। यहाँ पर उनके चरित्र का दर्शन बड़े सांकेतिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रश्न उठता है कि भगवान को हम किस रूप में देखें ? वेदांत की मान्यता है कि ब्रह्म सम है और भक्तों की मान्यता है कि भगवान पक्षपाती है, अब दोनों में सही बात कौन-सी है ? ईश्वर सम है कि विषम ? इसका सांकेतिक उत्तर यह है कि एक साथ दोनों की रक्षा करना ही ईश्वर की विलक्षणता है। एक दृष्टांत के द्वारा हम इसे आपके सामने रखते हैं। मान लीजिए एक वैद्य के पास दस रोगी आये हुए हैं। अब वैद्य का कर्तव्य क्या है ? यही है कि वह समस्त रोगियों के प्रति सम हो। समता का एक अर्थ तो यह हुआ कि जितने रोगी आये हुए हैं उन सबको एक ही दवा दे दें, एक ही पथ्य बता दें और कह दें कि हम तो सब के प्रति सम हैं। अगर चिकित्सक ऐसी समता दिखाने लगें, तो बेचारे रोगियों की क्या दशा होगी ? इसे समझना कठिन नहीं है, तो समता का अभिप्राय है परिणाम में सम होना, व्यवहार में नहीं। व्यवहार में जिसको कड़वी दवा दी, उसे देखकर लगेगा कि उसके प्रति द्वेष भाव है, पर दोनों का परिणाम क्या हुआ ? यही महत्वपूर्ण है। व्यवहार में एक को मीठी और दूसरे को कड़वी दवा दी गयी, पर उसके पीछे वैद्य की भावना यही है कि परिणाम दोनों का सम हो। दोनों स्वस्थ हो जायँ।
No comments:
Post a Comment