सुग्रीव के मन में क्रमशः एक महान परिवर्तन आता है, अंगद के प्रति उनके मन में उदार वृत्ति का उदय होता है और भय के कारण वे भोगों से विरत हो पाते हैं। तो धर्मशास्त्र में नरक के भय से और भक्ति में भगवान के भय से व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन आता है, स्वार्थपरता और भोग की वृत्ति नियंत्रित होती है। मृत्यु का भय व्यक्ति के संग्रह की वृत्ति को नियंत्रित करता है। व्यक्ति चाहे जितना संग्रह करे, मृत्यु के बाद सब छूट जाता है। अगर सही अर्थों में यह ईश्वर और मृत्यु का भय व्यक्ति के जीवन में आ जाय तो वह समझने लग जाता है कि जीवन में केवल भोग ही नहीं, त्याग की भी अपेक्षा है, केवल लोभ ही नहीं, दान की भी अपेक्षा है। और इसी प्रकार से धर्म में प्रलोभन की बात कही गयी। उसमें कहा गया कि व्यक्ति जो कुछ यहाँ दूसरों को देता है, वही कई गुना होकर उसे स्वर्ग में और अगले कई जन्मों में मिलता रहता है। इसका अभिप्राय यह है कि निरन्तर अपने स्वार्थ का ही चिन्तन करने वाला भोगी व्यक्ति, त्याग की दिशा में स्वयं कभी प्रवृत्त नहीं होता और त्याग के बिना पूर्ण सुख-शांति और जीवन की सार्थकता वह प्राप्त नहीं कर सकता।
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