सुग्रीव जब राज्य पाकर भोगों में लिप्त होकर भगवान को भूल गये, तब भगवान राम ने लक्ष्मणजी से कहा कि सुग्रीव पहले से डरा हुआ था, इसलिए मेरी शरण में आया और जब मैंने उसका भय दूर कर दिया, तो उलटा वह मुझे ही भूल गया। तुम जाओ, लेकिन उसे मारने की आवश्यकता नहीं है, बस उसमें फिर से थोड़ा भय उत्पन्न कर दो। लक्ष्मणजी उठकर बोले कि मैं अभी उसे डरा देता हूँ। यह तो मेरा प्रिय कार्य है। मैं स्वयं आपसे डरता हूँ और चाहता हूँ कि जीव भी आपसे निरन्तर डरता रहे। भगवान ने तुरन्त लक्ष्मणजी का हाथ पकड़ लिया और धीरे से बोले कि देखो ! ध्यान रखना ! उसमें दो बड़ी दुर्बलताएँ हैं, एक तो वह डरपोक है और दूसरे भगोड़ा। उसे डराना, पर देखना कि कहीं वह डरकर भाग न जाय। उसे डराकर यहीं ले आना। पहले तो वह संसार से डरकर भागा हुआ मेरे पास आया, यह तो डरकर भागने की सार्थकता है, पर अब कहीं ऐसा न हो कि मुझसे डरकर वह संसार की ओर भाग जाय। यह तो डर का दुरुपयोग हो जायेगा। इसलिए तुम डर का सदुपयोग करना।
No comments:
Post a Comment