Friday, 23 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

भगवान राम ने सुग्रीव को राज्य तो दिया, पर उनके चरित्र का दर्शन क्या है ? परम्परा यह है कि राजा के पुत्र को ही राज्य मिलता है, लेकिन भगवान राम को यह परम्परा स्वीकार नहीं है। उन्होंने राजा सुग्रीव को बनाया और उत्तराधिकारी का पद अंगद को दिया, सुग्रीव के बेटे को नहीं। यही सुन्दर सामंजस्य है। राज्य पाकर सुग्रीव जब पूछते हैं कि अब मेरे लिए क्या आदेश है ? तब भगवान ने आदेश दिया कि जाओ ! राज्य चलाओ, लेकिन राज्य तुम अकेले, अपनी इच्छा से मत चलाना। तो कैसे चलाना - याद रखना ! बालि ने यह भूल की थी, उसने भाई और बेटे में भेद किया था। बालि के चरित्र में यह दुर्बलता थी। मान लीजिए ! बालि के मंत्रियों ने सुग्रीव के स्थान पर अंगद को सिंहासन पर बिठा दिया होता और बालि लौटकर आते, तो क्या वे अंगद से भी वही व्यवहार करते, जो उन्होंने सुग्रीव के साथ किया ? बिल्कुल नहीं। तब तो उन्हें संतोष हो जाता कि चलो, कोई बात नहीं, मेरा बेटा ही तो सिंहासन पर बैठा हुआ है, पर उसने भाई और बेटे में भेद किया। यह भेदवृत्ति बालि के चरित्र की दुर्बलता है, जो उसके परिवार में अशांति और कलह की सृष्टि करती है और यही हमारे और आपके जीवन में भी दिखाई देती है और उसका परिणाम भी हम देख रहे हैं। भगवान श्री राघवेन्द्र कामकाज का सूत्र देते हुए सुग्रीव से कह देते हैं - सुग्रीव ! इस बात को तुम अच्छी तरह याद रखना कि राज्य तुम अकेले नहीं चलाओगे ! बालि ने जो भूल की उसे तुम दुहराना मत ! अंगद के साथ मिलकर, उसकी सलाह लेकर, दोनों एक मत होकर राज्य चलाना। यही मेरा आदेश है।

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