Wednesday, 7 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

सीताजी मृग रूपी मारीच को देखकर कहती हैं कि इस मृग का चमड़ा बड़ा सुन्दर है, और साथ-साथ कह दिया - प्रभु प्रहार करके इसका वध कीजिए। यह कैसी विचित्र माँग है ? पर उनका अभिप्राय क्या है ? प्रभु! आप इसकी चंचलता मिटा दीजिए। जो मन अपनी चंचलता मिटाने में समर्थ नहीं है, उसकी चंचलता आप अपने प्रहार से मिटा दीजिए और तब भगवान श्रीराघवेन्द्र तुरन्त मारीच के पीछे चले। भक्ति ने प्रेरणा दी, ज्ञान मायामृग के पीछे भगा और मन इतना अधिक चंचल है कि भगवान राम ने कठिन बाण से उसे मारा। यह ज्ञान का प्रहार है - माया के ऊपर, ज्ञान का प्रहार मन की चंचलता के ऊपर और अन्त में जो बचा हुआ काम था, वह किसने पूरा किया ? वह लक्ष्मणजी ने पूरा किया। पूरा करने का यह तीसरा कार्य क्या है ? मृग से जब चमड़ा अलग किया जायेगा, रक्त-मांस को अलग कर दिया जायेगा और उसे पूरी तौर से सुखा लिया जायेगा, तब वह चमड़ा आसन के रूप में उपयोग किया जा सकेगा और इसका अभिप्राय क्या है ? जब तक मन में राग का रक्त बना रहेगा तब तक वह भगवान के बैठने योग्य नहीं होगा। उसके राग का रक्त निकाल दिया जाय और उसे पूरी तरह से सुखा दिया जाय, तब वह भगवान के बैठने योग्य होगा। यह भूमिका भगवान ने वैराग्य को, लक्ष्मणजी को सौंपी। भाई! चमड़े से रक्त को अलग करना, उसको सुखाना और राग को मिटाना तुम्हारा काम है।

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