Thursday, 1 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

.......कल से आगे.......
जब भगवान राम ने गोस्वामीजी से पूछा कि सारी पद्धतियों में, सारे रूपों में हमारा कौन सा रूप तुम्हें सबसे अधिक प्रिय है। तो गोस्वामीजी ने धीरे से अपना पक्षपात प्रकट कर दिया। भगवान राम जब लंका में आकर सुवेल शैल पर आसीन हुए तो गोस्वामीजी ने उनका एक चित्र प्रस्तुत किया और उसके साथ अपना पक्षपात जोड़ दिया। वे कहने लगे -
एहि विधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।
धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लवलीन।।
धन्य हैं वे लोग, जो भगवान के इस ध्यान में डूबे हुए हैं। गोस्वामीजी से भगवान पूछ सकते हैं कि मिथिला की इतनी मधुर झाँकी, चित्रकूट का इतना सुन्दर वेश, उनके साथ तुमने यह शब्द नहीं जोड़ा, इस लंका की झाँकी में ऐसा कौन सा आकर्षण है जो तुमने ऐसा कह दिया ? गोस्वामीजी ने कहा कि महाराज ! मेरे सामने एक ही समस्या है। क्या ? अगर अयोध्या की झाँकी ह्रदय में लाना चाहें तो पहले ह्रदय को अयोध्या बनाना पड़ेगा। अगर मिथिला की झाँकी, दूल्हे के रूप में आपको लाना चाहें, तो ह्रदय को पहले मिथिला बनाना पड़ेगा। अगर चित्रकूट की झाँकी लाना चाहें, तो उसे चित्रकूट बनाना तो कठिन है, पर जब से मैंने सुना है कि आप लंका में भी आ सकते हैं, तो ह्रदय को लंका बनाना नहीं है, वह तो बनी-बनायी पड़ी है, इसलिए मैं सोचता हूँ कि हमारे लिए यही झाँकी अच्छी है।

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