........कल से आगे......
लंका में भगवान के लिए लक्ष्मणजी ने स्थान का चुनाव किया एक शिखर पर, जहाँ पर कुछ समतल भूमि दिखाई पड़ी। बड़ी सांकेतिक भाषा है। जहाँ पर शिखर है वहाँ पर समता ढूँढना तो कठिन ही है, लेकिन लक्ष्मणजी ढूँढ लेते हैं। यही नहीं, लंका कितनी भी बुरी क्यों न हो, कहीं न कहीं कोई कोना अच्छा मिल ही जाता है। प्रत्येक व्यक्ति की यही स्थिति है। भले ही हमारे अन्तर्जीवन पर रावण का शासन हो, दुर्गुणों का शासन हो, पर ऐसा नहीं हो सकता कि जीवन का कोई कोना खाली न पड़ा हो। जिन तीन शिखरों पर लंका बसी हुई है, वे हैं - सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के शिखर। रजोगुण और तमोगुण के शिखरों पर रावण सक्रिय है और सत्व का शिखर खाली पड़ा है। रावण ने इसे व्यर्थ समझकर छोड़ रखा है। इसका अभिप्राय यह है कि रावण शासित जीवन या तो रजोगुण द्वारा संचालित है अथवा तमोगुण द्वारा। सत्व भी वहाँ पर है, भले ही वह सक्रिय न हो। उस सत्य में लक्ष्मणजी कहीं न कहीं समतल भूमि खोज लेते हैं और उस पर भगवान के लिए आसन बिछाते हैं।
लंका में भगवान के लिए लक्ष्मणजी ने स्थान का चुनाव किया एक शिखर पर, जहाँ पर कुछ समतल भूमि दिखाई पड़ी। बड़ी सांकेतिक भाषा है। जहाँ पर शिखर है वहाँ पर समता ढूँढना तो कठिन ही है, लेकिन लक्ष्मणजी ढूँढ लेते हैं। यही नहीं, लंका कितनी भी बुरी क्यों न हो, कहीं न कहीं कोई कोना अच्छा मिल ही जाता है। प्रत्येक व्यक्ति की यही स्थिति है। भले ही हमारे अन्तर्जीवन पर रावण का शासन हो, दुर्गुणों का शासन हो, पर ऐसा नहीं हो सकता कि जीवन का कोई कोना खाली न पड़ा हो। जिन तीन शिखरों पर लंका बसी हुई है, वे हैं - सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के शिखर। रजोगुण और तमोगुण के शिखरों पर रावण सक्रिय है और सत्व का शिखर खाली पड़ा है। रावण ने इसे व्यर्थ समझकर छोड़ रखा है। इसका अभिप्राय यह है कि रावण शासित जीवन या तो रजोगुण द्वारा संचालित है अथवा तमोगुण द्वारा। सत्व भी वहाँ पर है, भले ही वह सक्रिय न हो। उस सत्य में लक्ष्मणजी कहीं न कहीं समतल भूमि खोज लेते हैं और उस पर भगवान के लिए आसन बिछाते हैं।
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