मारीच प्रसंग में गोस्वामीजी गीतावली रामायण में कहते हैं - लखन ललित लिये मृगछाला - लक्ष्मणजी जब लौटे तो उन्होंने मृगचर्म को बगल में दबा रखा था। लंका के सुवेल शैल पर लक्ष्मणजी ने इसी मृगचर्म का आसन बिछाकर भगवान राम को बिठाया। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की समवेत कृपा से निर्मित यह मृगचर्म जिसकी चंचलता मिट चुकी है, जो शान्त और विरक्त है, ऐसे मन पर आसीन होने के बाद ही रावण के विरुद्ध भगवान का युद्ध प्रारंभ होता है और उस युद्ध में रावण का विनाश होता है। यह मानो अन्तःकरण में मन का जो निर्माण है, वहाँ हमारी असमर्थता की स्थिति में भगवान स्वयं आकर हमारी प्रार्थना को स्वीकार करें, बुराइयों को नष्ट करें, यही इस ध्यान का समग्र रहस्य है।
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