Saturday, 10 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

रामचरितमानस के अंत में गरूड़जी द्वारा काकभुशुण्डिजी से सात प्रश्न किये गये। उनमें से सातवें और अन्तिम प्रश्न के उत्तर में काकभुशुण्डिजी ने मानस-रोगों का वर्णन किया तथा उनकी चिकित्सा पध्दति बतायी। उन्होंने यह विश्लेषण आयुर्वेद की पद्धति से किया। आयुर्वेद की मान्यता यह है कि व्यक्ति के शरीर मे रोग चाहे जितने उत्पन्न हों, पर उन सबके मूल में केवल तीन ही वस्तुएँ हैं - कफ, वात एवं पित्त और इन तीनों के मूल में भी प्रेरक वस्तु एक ही है। उसी एक से तीन और उस तीन से न जाने कितने रोग सहस्रों रूपों में सक्रिय हो जाते हैं। इसमें जो एक क्रम है, मानस-रोगों में भी गोस्वामीजी ने उसी क्रम को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि मन में जितने भी विकार हैं, उनके मूल में मोह की वृत्ति ही विद्यमान है। यही मोह की प्रवृत्ति क्रमशः काम, क्रोध एवं लोभ - तीन रूपों में प्रकट होती है और इन्हीं से अगणित मानसिक विकार उत्पन्न होकर मानस जीवन पर शासन करने लग जाते हैं।

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