Tuesday, 27 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

भगवान लक्ष्मणजी से कहते हैं कि मेरे सखा सुग्रीव को भय दिखाकर यहाँ ले आओ और लक्ष्मणजी यही करते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि कभी-कभी जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु को सहजता से नहीं छोड़ पाता, भोग और वासनाओं को नहीं छोड़ पाता, भय एक ऐसी वृत्ति है जिससे सब छुड़ाया जा सकता है। यह बात शरीर के रोगों के संदर्भ में भी दिखाई देती है और मन के रोगों के संदर्भ में भी। शरीर के रोगों में तो डराने वाले ये डॉक्टर और वैद्य हैं, अगर कह दिया कि नमक खाओगे तो मर जाओगे। अब बेचारा मरीज, जो नमक नहीं छोड़ पा रहा था, मृत्यु के डर से उसका नमक खाना छूट गया। इस तरह भय की भी सार्थकता है। इस संदर्भ में एक बात पर विचार करके देखें। जैसे मृत्यु या रोग के भय से हम कुपथ्य छोड़ देते हैं, उसी तरह अगर ईश्वर से डरकर हम पाप और असत्कर्म छोड़ दें, तो डर की इससे अच्छी सार्थकता और क्या होगी ? और इस प्रसंग में हुआ भी यही। सुग्रीव डर गये। इस डर का परिणाम यह हुआ कि वे पुनः लौटकर भगवान के चरणों में आ गये और सच्चे अर्थों में उन्होंने जनकनन्दिनी सीताजी का पता लगाया और इतना ही नहीं, अंगद के प्रति भी उन्होंने अत्यंत उदारता का परिचय दिया। भगवान जैसा चाहते थे, आगे चलकर सुग्रीव के चरित्र का वैसा ही विकास हुआ और उनके जीवन में सामंजस्य आया।

No comments:

Post a Comment