भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कामकाज और रामकाज का श्रेष्ठतम सूत्र सुग्रीव को दिया, पर सुग्रीव उसे पूरी तरह से ह्रदयंगम नहीं कर पाये। वे राज्य पाकर कामकाज में और उससे भी अधिक भोगों में डूब जाते हैं। भगवान को वे भूल गये, कई दिनों तक भगवान से मिलने ही नहीं आये। कभी याद आने पर वे अपने आपको यह सोचकर भुलावा देते रहे कि भगवान ने सीताजी का पता लगाने अवश्य कहा है, पर इसमें उन्होंने समय का कोई बंधन तो नहीं लगाया है। हम लोग भी प्रायः यही सोचते हैं कि भक्ति और भगवान की बात फिर कभी कर लेंगे, अभी जल्दी क्या है ? और तब भगवान किसको याद करते हैं ? पहले तो अपने बाण की याद करते हैं। कहते हैं कि लक्ष्मण ! मैंने सोचा है कि जिस बाण से मैंने बालि के ऊपर प्रहार किया था, उसी बाण का प्रहार मैं सुग्रीव पर भी करूँगा। बड़ी विचित्र गुत्थी है। सीधे कह सकते थे कि मैं सुग्रीव को मारूँगा। जिस बाण से बालि को मारा, उसी बाण से सुग्रीव को मारूँगा यह कहने की क्या आवश्यकता थी ? भगवान का तात्पर्य यह था कि मेरे पास दो रोगी आये थे। एक को मैंने मीठी दवा दी और दूसरे को कड़वी। राज्य देकर मैंने सुग्रीव को मीठी दवा और बालि के छाती पर बाण चलाकर उसे कड़वी दवा दी, लेकिन बड़ी विचित्र बात है, जिसे मैंने मीठी दवा दी, वह तो फिर रोगी हो गया और जिसे कड़वी दवा दी, वह निरभिमान होकर मेरे धाम में पहुँच गया। तो लगता है कि कड़वी दवा में कुछ अधिक चमत्कार है। इसलिए उसी दवा का प्रयोग जरा सुग्रीव पर भी करके देखें।
No comments:
Post a Comment