ज्ञानियों ने, भक्तों ने और धर्मशास्त्र ने लोभ-ईर्ष्या आदि निकृष्ट वृत्तियों को लिए समाधान देने की चेष्टा की, पर इस समाधान के बावजूद व्यक्ति के मन के ये रोग इतने उलझे हुए हैं कि वह इन समाधानों का भी दुरुपयोग कर बैठता है। जैसे यह जो डर का सिद्धांत है, रोगी मन इसका दुरुपयोग कर सकता है या नहीं ? कर सकता है। कैसे ? यदि वह ईश्वर का डर दूसरों को दिखावे और स्वयं डर से मुक्त रहे, दूसरों को त्याग की शिक्षा दे और अपने जीवन में संग्रह कर ले ; और व्यवहार में ऐसा दिखाई भी देता है। व्यक्ति सिद्धांत की बात तो करता है, पर वह स्वयं के जीवन में उसका दुरुपयोग करता है। इसलिए समस्या के किसी एक पक्ष को लेकर उसका जो समाधान होगा, वह एकांगी होगा। समाधान की समग्रता तो तभी होगी, जब उसमें सभी पक्षों का समन्वय होगा। अगर कहा जाय कि केवल भीतर का सुख ढूढ़ों, बाहर देखो ही मत, तो यह अतिरेक होगा और केवल बाहर के सुख को महत्व दें, भीतर बिल्कुल न देखें तो क्या होगा ? अगर केवल अंतरंग सुख के महत्व दिया गया, तो परिणाम यह होगा कि जीवनयापन के लिए बाह्य आवश्यकता की जो वस्तुएँ हैं, उनका अभाव हो जायेगा और यदि केवल बाह्य सुख को महत्व दिया गया, तो उसका परिणाम होगा कि समाज की बहिरंग दरिद्रता तो मिट जायेगी, पर इस लोभ और ईर्ष्या की वृत्ति की कोई सीमा नहीं रह जायेगी। भौतिक पदार्थों के साथ तो यह समस्या जुड़ी ही रहती है कि जितनी भी हमारी आवश्यकताएँ पूरी होती जाती हैं, लोभ उतना ही बढ़ता जाता है, मन की भूख बढ़ती जाती है। जिनके पास भोग है वे और अधिक का लोभ करते हैं और जिनके पास नहीं है, वे ईर्ष्या करते हैं। यह लोभ और ईर्ष्या दोनों एक दूसरे की पूरक वृत्तियाँ हैं। लोभ से ईर्ष्या उत्पन्न होती है और ईर्ष्यालु व्यक्ति स्वयं लोभी बन जाता है।
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