Tuesday, 20 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

ईश्वर के पद-चिह्नों का संरक्षण अर्थात मर्यादा का संरक्षण। इसका अभिप्राय क्या है ? मर्यादा माने क्या ? भगवान श्रीराम को सूचना दी गयी कि कल आप अयोध्या के राजसिंहासन पर बैंठेंगे और उस सूचना को सुनकर भगवान राम के मन में जो प्रतिक्रिया हुई, वही भगवान राम की बनायी हुई वह रेखा, वह पदचिह्न है, जिसे उन्होंने अपने व्यवहार और चरित्र के माध्यम से समाज के समक्ष प्रकट किया। व्यक्ति राज्य और सत्ता पाने के लिए निरन्तर व्यग्र रहता है। इसके लिए अन्याय और अधर्म करने में भी वह रंचमात्र संकोच नहीं करता, पर राज्य पाने की सूचना पाकर भगवान राम के मन में जो प्रतिक्रिया हुई, यही भगवान राम के चरित्र का दर्शन है। समाचार सुनकर प्रभु उदास हो गये। यद्यपि राम कुछ बड़े हैं, पर सोचते हैं कि हम चारों भाइयों का जन्म एक साथ हुआ, साथ खेले, उपनयन और विवाह भी एक साथ हुआ, उदास क्यों हो गये ? भगवान राम उदास होकर सोचने लगे कि इस पवित्र सूर्यवंश में यही परम्परा बड़ी बुरी है कि छोटे को छोड़कर बड़े को राज्य दिया जाता है। मानस की इस पंक्ति का तात्पर्य यह नहीं है कि इसे पढ़कर लोग गदगद हो जायँ, यह सोचकर आँखों में आँसू आ जायँ कि भगवान राम दूसरों का कितना ध्यान रखते हैं। गोस्वामीजी तुरन्त कहते हैं कि भगवान राम के ह्रदय में यह जो भावना है, उससे प्रेरित होकर यदि हम अपने से छोटों के प्रति ध्यान रखें, तो हम सही अर्थों में भगवान राम के पदचिह्नों को बचाकर उन्हें ठीक-ठीक अपने जीवन में स्वीकार कर पायेंगे। इस प्रसंग को पढ़ने के बाद भी अगर हममें दूसरों के सुख-साधनों को छीनकर स्वयं सुखी होने की वृत्ति बनी रही, तब तो हम भगवान के पदचिह्नों को नहीं बचा पाये। इसे पढ़ने के बाद तो परिणाम यह होना चाहिए- हमारी स्वार्थपरता, कुटिलता और सठता की वृत्ति दूर हो जाय।

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