Sunday, 11 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............,,,,

गोस्वामीजी ने लिखा है -
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।
तिन्ह के पुनि उपजहिं बहु सूला।।
मोह ही समस्त ब्याधियों का मूल है और उससे ही अगणित रोग उत्पन्न होते हैं। यह मोह क्या है ? मोह की व्याख्या की गयी - मोहश्चित्त विषर्यय: - चित्त में विपरीतता की स्थिति उत्पन्न हो जाना - यही मोह की वृत्ति का लक्षण है। यद्यपि मन और शरीर का संदर्भ अलग-अलग है, पर मोह की वृत्ति दोनों संदर्भों में समान रूप से प्रेरक है। शरीर के संदर्भ में स्वस्थ रहने का उपाय हम जानते हैं। स्वस्थता के लिए नियम, संयम और पथ्य आदि सब हम जानते हैं, पर बड़ी विचित्र विडम्बना है कि व्यक्ति पथ्य और कुपथ्य का भेद जानकर भी कुपथ्य को अस्वीकार नहीं कर पाता। कुपथ्य को जानबूझकर ग्रहण कर लेता है। यही मोह की स्थिति है। मन के संदर्भ में भी यही सत्य है कि जिन सच्चाइयों को हम जानते हैं, उनकी भी जानबूझकर अवहेलना करते हैं। इसी मोह की वृत्ति के कारण हमारा मन अस्वस्थ हो जाता है और जीवन में अनेक दुर्गुण-दुर्विचार आ जाते हैं।

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