Saturday, 3 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................

भगवान राम को जब कोई बुलाता है तो उसके लिए आसन की व्यवस्था करता है। अयोध्या में भगवान का आसन है - सिंहासन। जब रामराज्य बनता है तब भगवान सिंहासन पर बैठते हैं। मिथिला में महाराज जनक ने उन्हें वरासन पर बिठाया और चित्रकूट में जनकनन्दिनी सीताजी ने वट वृक्ष की छाया में बड़ी सुन्दर वेदी बनाकर उस पर कुशासन बिछाया, जिस पर भगवान राम विराजमान हैं। यह बड़ी सांकेतिक भाषा है। सिंहासन धर्म का आसन है। यहीं से रामराज्य का संचालन होता है। वरासन ज्ञान का आसन है। महाराज जनक महान तत्वज्ञ हैं, उनके लिए ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है, सर्वश्रेष्ठ ही वरणीय है और चित्रकूट में जो वेदी है वह साक्षात भक्तिदेवी की बनायी हुई है। ये तीन स्थानों पर ये तीन आसन हैं। लेकिन लंका वाला आसन ! न सिंहासन, न वरासन और न कुशासन।  यहाँ तो भगवान को लक्ष्मण के कान में कहना पड़ा कि लंका चलना है, आसन भी साथ ही ले चलें। वहाँ हमें कोई आसन देने वाला नहीं है। गोस्वामीजी ने यहाँ पर साधना की एक बड़ी ही मार्मिक और तात्विक व्याख्या की है -
              ......आगे कल ......

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