लंका में सुवेल शिखर पर लक्ष्मणजी समतल भूमि खोजकर उस पर भगवान के लिए आसन बिछाते हैं। पहले सुन्दर कोमल-कोमल पत्ते बिछाते हैं। पत्तों के ऊपर फूल की पंखुड़ियाँ बिखरते हैं और उसके ऊपर मृगचर्म बिछाते हैं, उसी आसन के ऊपर भगवान राम आसीन हैं। सिंहासन तो धर्म का आसन है, वरासन ज्ञान का आसन है और कुशासन भक्ति का, पर यह मृगचर्म ? यह कौन सा आसन है ? यह जो हमारे-आपके जीवन में बड़ी गहराई से जुड़ा हुआ सत्य है, उसे गोस्वामीजी ने मृगचर्म के माध्यम से प्रकट किया। यह मृगचर्म कौन सा है ? कहाँ से आया ? वस्तुतः यह मारीच का चमड़ा है जिसे लक्ष्मणजी ने भगवान के लिए बिछाया। मानो भगवान का संकेत यह है कि लंका में रावण ने आसन भले न दिया हो, पर मारीच को भेजा तो उसी ने था। तो उससे जो आसन बना, लंका में उसी आसन पर भगवान बैठे हैं। यह मारीच कौन है ? मारीच वस्तुतः व्यक्ति के घोर तमोमय चंचल मन का प्रतीक है, जो रावण के शासन में रहता है। ऐसा मन जो मोह के वशीभूत हो। मारीच को मारकर उसका आसन स्वयं ईश्वर को बनाना पड़ा। आज उसी आसन पर वे बैठे हुए हैं। इसका अभिप्राय यह है कि जो लोग अपने अन्तःकरण को ईश्वर के आसीन होने योग्य बना सकें, वे तो बना लें। लेकिन कभी किसी को अनुभव हो कि हम अपने अन्तर्मन को इस योग्य नहीं बना पा रहे हैं, उसमें अयोध्या के सिंहासन, मिथिला के वरासन और चित्रकूट के कुशासन जैसे निर्माण की क्षमता हममें नहीं है, तो उनके लिए प्रार्थना ही उपाय है, शरणागति ही उपाय है। उनसे प्रार्थना करें कि आज हम इस परिस्थिति में आ गये हैं कि हम चाहकर भी स्वयं को बदलने में समर्थ नहीं हैं। आप आकर स्वयं अपना आसन बनायें।
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