Tuesday, 6 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................

लंका में सुवेल शैल पर भगवान जिस आसन पर बैठते हैं, इस आसन के निर्माण में तीनों का हाथ है - भगवान राम का, सीताजी का और लक्ष्मणजी का। इसका सांकेतिक तात्पर्य यह है कि यह जो त्रयी है - ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की - उसका एक क्रम है। मन का निर्माण कैसे हुआ ? मारीच सबसे पहले सीताजी के सामने आया। पहले वह श्रीराम के सामने नहीं गया, क्योंकि उसको उनके बाण का पुराना अनुभव था। श्रीराम ने बाण मारकर उसे दूर फेंक दिया था। ज्ञान ने तो वही किया जो उसका स्वभाव है। अब इस समय जरा भक्ति की करुणा का आश्रय लें। भक्ति की कृपालुता का आश्रय लेने से शायद प्रभु मुझे पास बुला लें। भगवान ने मन के दोषों के रूप में मारीच को (महर्षि विश्वामित्रजी के यज्ञ की रक्षा करते समय ) दूर फेंक दिया था और जब मारीच अपने को नकली मृग के रूप में सीताजी के सामने ले जाता है, तब भक्तिदेवी की दृष्टि उस पर पड़ती है और तुरन्त उन्होंने भगवान राम से कहा - एहि मृग कर अति सुन्दर छाला। सीताजी जब मृग की प्रशंसा करने लगीं, तो किसी ने पूछ दिया कि आप सब कुछ जानते हुए भी उस मृग की प्रशंसा कैसे कर रही हैं ? इस पर उन्होंने क्या कहा ? प्रशंसा में उन्होंने यह नहीं कहा कि मृग बड़ा सुन्दर है। उनके शब्द हैं - इस मृग का चमड़ा बड़ा सुन्दर है। इन दोनों उक्तियों में अन्तर है। अभिप्राय यह है कि जब तक यह जीवित है, तब तक सुन्दर नहीं है, परन्तु जब वह मर जायेगा तब सुन्दर है और इसका तात्पर्य यह है कि मन की चंचलता जब तक जीवित है, तब तक वह सुन्दर नहीं है।

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