रामचरितमानस में प्रसंग आता है कि तीन यात्री वन के मार्ग में चले जा रहे हैं - भगवान श्रीराम, जनकनन्दिनी श्रीसीताजी और श्री लक्ष्मण। गोस्वामीजी इन तीनों यात्रियों का वर्णन करने के बाद कहते हैं कि जिसने भी इन्हें चलते हुए देखा है, या इन्हें ह्रदय में धारण किया है, वह व्यक्ति संसार - पथ को बड़ी सरलता से पार कर लेता है। इन तीनों यात्रियों के क्रम में तीन संकेत हैं। पहला संकेत है - आगे राम और इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि हम जीवनपथ में हम अकेले न चलें, अपितु ईश्वर को साथ लेकर चलें। अधिकांश व्यक्ति कह सकते हैं कि हम तो जब भी यात्रा प्रारंभ करते हैं, ईश्वर का स्मरण कर लेते हैं। हम तो निरन्तर ईश्वर को साथ लेकर चलते हैं। गोस्वामीजी तुरन्त एक शब्द कहकर सावधान कर देते हैं- आगे राम। ईश्वर को साथ लेकर चलते हैं पर आगे या पीछे ? इसका अभिप्राय यह है कि हम ईश्वर से यही कहते हैं कि हमारा जहाँ स्वार्थ है, जहाँ वासना है, वहाँ हम जा रहे हैं, आप भी हमारे पीछे-पीछे आइये। आगे-आगे चलकर सही दिशा हम बतायेंगे, आप हमारा अनुगमन करें। गोस्वामीजी कहते हैं - पीछे नहीं, आगे राम। कोई पूछ सकता है कि ईश्वर तो साथ में हैं, फिर आगे हैं या पीछे, इससे क्या फर्क पड़ता है ? नहीं, इसमें बहुत बड़ा अन्तर है।
......,आगे कल.......
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