एक व्यंग्य भरी कथा आपने सुनी होगी। किसी सज्जन ने एक महात्मा को एक शाल ओढ़ा दिया। महात्मा ने कहा कि मुझे नहीं चाहिए। आप इसे वापस ले लीजिए। उस सज्जन ने कहा कि महाराज ! यह शाल मैंने आपको दी थोड़े ही है, वह तो मैंने व्यापार किया है। क्या व्यापार किया है ? बोले कि मैं तो इस एक शाल के बदले कई शाल ले लूँगा। आप जैसे महात्मा को एक शाल दूँगा, तो मुझे अगले जन्म में इसका हजार गुना मिलेगा। महात्माजी भी बड़े विनोदी थे, उन्होंने शाल उतारकर कहा कि भई ! एक तो अभी ले जाओ। बाकी नौ सौ निन्यानवे अगले जन्म में ले लेना। इस तरह लोभ की वृत्ति से भी व्यक्ति दान में प्रवृत्त होता है। यद्यपि यह कोई बहुत ऊँची वृत्ति नहीं है, पर शास्त्र तो हर सोपान पर निकृष्ट वृत्तियों का निवारण कर उच्चतर और उच्चतम सोपानों तक व्यक्ति को उठाने के लिये प्रयत्नशील है।
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