Friday, 16 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

लोभ और ईर्ष्या एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान है। अब इसका समाधान क्या है ? इस समस्या के समाधान के लिए कई बातें सोची गयीं, वेदांत ने प्रयास किया, भक्ति और कर्मशास्त्र के द्वारा प्रयत्न हुआ तथा शासन भी इसके समाधान की चेष्टा करता है। इस लोभ और ईर्ष्या के समाधान के लिए शासनतंत्र के दण्ड का भय रहे तो उनमें लोभ और संग्रह की वृत्ति न आकर दान की वृत्ति आयेगी। कर इत्यादि के रूप में शासन इसे नियंत्रित करने की चेष्टा करता है। इस तरह भय की वृत्ति भी एक उपाय है। धर्म में भी उस भय का प्रयोग किया गया, पर दूसरे रूप में और उसके साथ प्रलोभन भी जोड़ दिया गया। धर्म में एक ओर तो यह भय दिखाया गया कि अन्याय तथा भ्रष्टाचार के द्वारा तुम जो कुछ भी संचय करोगे। वह सब अन्त में छोड़कर खाली हाथ जाना होगा। इस प्रकार धर्म में मृत्यु और पुनर्जन्म का भय दिखाया गया और भक्तों ने भगवान का भय दिखाया। अतः भय की वृत्ति के द्वारा भी भ्रष्टाचार से बचा जा सकता है।

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