निकृष्ट वृत्तियों के लिए या तो धर्म का मार्ग है, या भक्ति अथवा ज्ञान का। ज्ञान का मार्ग क्या है ? यहाँ सुख की परिभाषा बदल दी गयी। कहा गया कि सुख वैभव में नहीं, विषयों में नहीं, वह तो आत्मा में ही उपलब्ध है। वस्तुतः सुख तो अपने भीतर है। बाहर के सुख में तो बँटवारे का झगड़ा है, पर भीतर का जो सुख है, आत्मा का जो सुख है, उसमें बँटवारे का कोई झगड़ा नहीं, कोई छीना-झपटी नहीं। जब हम अपने बाहरी जीवन में संग्रह करते हैं, तो लोभ के कारण अधिक संग्रह कर लेते हैं। उसे देखकर अन्य लोगों को ईर्ष्या होती है और इससे टकराव उत्पन्न होता है। ऐसी स्थिति में संतों ने सुख को अपने भीतर खोजने की, अन्तर के आनन्द को ढूँढने की प्रेरणा दी। संतों ने कहा कि वास्तविक सुख पदार्थ और वैभव में नहीं है, वह तो आत्मसुख में है। इस तरह उन्होंने इस सुख के वितरण का समाधान दिया। जब यह ज्ञात हो गया कि बहिरंग पदार्थों में सुख नहीं है, सुख तो अपने अन्तर में है, तब उस अन्तर के सुख को पाकर बाह्य सुख के लोभ को छोड़ें और अपने संग्रह को उन लोगों में वितरित कर दें, जिन्हें उसकी आवश्यकता है। इससे संग्रहजन्य लोभ-ईर्ष्या आदि की जो वृत्तियाँ हैं और जिनके कारण समाज में टकराव की वृत्ति बनती है, उनका समाधान होगा।
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