Monday, 12 October 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............

मोह ही समस्त व्याधियों का मूल है। फिर चाहे वह शरीर की ब्याधि हो या मन की, इसी एक मोह से प्रभावित होती हैं। मन और शरीर को विकृत करने में समान रूप से कारण - यह मोह तीन वस्तुओं को विकृत कर अगणित ब्याधियाँ उत्पन्न करता है, वे शरीर के संदर्भ में वात, पित्त और कफ हैं तथा मन के संदर्भ में काम, क्रोध और लोभ। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में वात, पित्त और कफ विद्यमान है, पर आयुर्वेद में इनके और अधिक सूक्ष्म अध्ययन की दृष्टि से इन्हें पुनः तीन भागों में विभाजित किया गया है। यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में ये तीनों विद्यमान रहते हैं, पर किसी शरीर में वात की प्रधानता होती है, तो किसी में पित्त की और किसी में कफ की। इन तीनों की प्रधानता को दृष्टि में रखकर मनुष्यों का विभाजन किया गया है - वातप्रधान, पित्तप्रधान और कफप्रधान। अब इसी सूत्र को गोस्वामीजी मन के संदर्भ में जोड़ देते हैं। वे कहते हैं कि ठीक शरीर के तत्व की ही भाँति मन में भी काम, क्रोध और लोभ विद्यमान रहते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति के मन में काम की प्रधानता रहती है, किसी में क्रोध की और किसी में लोभ की और यह स्पष्ट दिखाई भी देता है कि व्यक्ति इन तीनों में से किसी एक से ग्रस्त रहता है, घिरा हुआ रहता है।

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