शरीर के संदर्भ में जैसे पेट के रोगों का संबंध बहुधा पित्त से होता है और श्वासतंत्र से संबंधित रोगों का कफ से। इसी प्रकार मन के संदर्भ में क्रोध की तुलना गोस्वामीजी पित्त से करते हैं - अहंकार होने के कारण क्रोध आता है। क्रोध अहंकार की ही अभिव्यक्ति है। क्रोध क्यों आता है ? जैसे पित्त की विकृति से पेट रूग्ण हो जाता है, भोजन का पचना कठिन हो जाता है इसी प्रकार अहंकार को चोट पहुँचने पर क्रोध आता है। क्रोध और अहंकार बड़ी गहराई से जुड़े हुए हैं। इसी प्रकार श्वासतंत्र से जुड़ा हुआ है - कफ और अब हम जिस रोग की चर्चा करने जा रहे हैं, वह है राजयक्ष्मा। आपने देखा होगा कि जो यक्ष्मा के रोगी हैं, उन्हें बहुधा कफ निकला करता है और उस कफ में रोग के कीटाणु विद्यमान रहते हैं। उसका ह्रदय उस कफ से आक्रांत रहता है और उससे वह दुखी रहता है। इसे ही गोस्वामीजी मन के संदर्भ में कहते हैं - दूसरों के सुख को देखकर ह्रदय में जलन होना, यही मन की यक्ष्मा है। यह मूलतः लोभ की शाखा का रोग है। जैसे काम के साथ आसक्ति जुड़ी हुई है, कामी व्यक्ति के जीवन में काम के परिणाम स्वरूप आसक्ति का जन्म होगा। उसी तरह लोभ के साथ ईर्ष्या के साथ ईर्ष्या जुड़ी हुई है। लोभी व्यक्ति ईर्ष्यालु अवश्य होगा। लोभी व्यक्ति में लोभ जितना अधिक होगा, वह ईर्ष्यालु भी उतना ही अधिक होगा।
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