Tuesday, 10 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

रामायण में श्री भरत अपनी बड़ी निन्दा करते हैं। भगवान श्रीराम ने भरत की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम्हारे समान सन्त और गुणवान संसार में और कोई नहीं है। यह कहने के बाद उन्होंने भरतजी से पूछा कि मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह ठीक है या नहीं ? भरतजी ने कहा प्रभो ! यह कहने का महान दुस्साहस भला कौन करेगा कि आपने ठीक नहीं कहा ! श्रीराम ने कहा कि अगर मैं ठीक कह रहा हूँ तो भरत ! तुम्हारा कहना सही नहीं है ! तुम जो यह कहते हो कि मैं सबसे बड़ा पापी हूँ, यह बात अब फिर कभी न कहना ! भरतजी ने कहा कि महाराज ! आप जो कह रहे हैं, वह तो सत्य है ही, पर मैं जो कह रहा हूँ वह भी तो असत्य नहीं है। यह कैसे हो सकता है कि दोनों विपरीत बातें एक साथ सत्य हों ! या तो तुम्हारी बात सत्य होगी या फिर मेरी ! तो श्रीभरतजी ने कहा कि महाराज ! जैसे लोहे का एक टुकड़ा तो लोहा ही है। उसे कोई भी परीक्षा करके यही कहेगा कि यह लोहा है, पर यदि कोई यदि पारस के पास ले जाकर कहे कि आप इसकी परीक्षा करके बताइए कि यह क्या है ? तब क्या होगा ? उसकी परीक्षा करने के लिए पारस जैसे ही उसे अपने हाथ में लेगा, उसके स्पर्श से लोहा तुरन्त सोना हो जायेगा। तो यह लोहे का चमत्कार है कि पारस का ? श्रीभरतजी कहते हैं कि प्रभो ! था तो मैं लोहा ही, पर अब लगता है कि पारस का स्पर्श हो गया है।

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