सती को दक्षपुत्री होने के कारण अपनी बुध्दिमता पर बड़ा अहंकार है। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार नहीं की। भगवान की परीक्षा लेने चल पड़ी। सती के रोग को दूर करने के लिए बड़ी लम्बी चिकित्सा करनी पड़ी। सती दोनों का तिरस्कार करती चली गयीं, वैद्य का भी और औषध का भी। शंकरजी सतगुरु हैं, वैद्य हैं और रामकथा औषध है। सतीजी अगत्स्य के आश्रम में गयीं तो रामकथा का तिरस्कार किया। इसका तात्पर्य यह है कि उन्होंने दवा स्वीकार नहीं की और शंकरजी की बात नहीं मानी। इस तरह के रोगी जिसे वैद्य और दवा दोनों पर विश्वास न हो, तो उस रोगी का क्या होगा, आप कल्पना कर सकते हैं। सती को अपने रोग निवारण के लिए बड़ी लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा और अन्त में अपने सती शरीर को छोड़ना भी पड़ा।
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