लंका में अशोक वाटिका में मेघनाद ने जब हनुमानजी पर ब्रह्मास्त्र चलाया, तब हनुमानजी ने उससे यही कहा कि मैं चाहूँ तो न बँधू, ब्रह्मास्त्र का भी मुझ पर कोई प्रभाव नहीं होगा, लेकिन ब्रह्मास्त्र की जो महिमा है, उसे मैं स्वेच्छा से स्वीकार करता हूँ और इस बंधन को स्वीकार करने के पीछे तो हनुमानजी का एक बड़ा दूरगामी उद्देश्य था। हनुमानजी ने जब रावण की वाटिका के फलों को खाया, तब वे खुले हुए थे, पर रावण की सभा में गये, तो बँधकर गये। क्यों ? हनुमानजी के सामने एक समस्या आ गयी थी। त्रिजटा ने श्रीसीताजी और समस्त राक्षसियों से कहा कि मैंने एक स्वप्न देखा कि एक बंदर आया है, वह लंका को जलायेगा। अब हनुमानजी बड़े सोच में पड़ गये कि भगवान ने तो मुझे लंका जलाने का आदेश दिया नहीं है और त्रिजटा लंका जलाने की बात कह रही है। अब किसकी बात मानें, भगवान की या सन्त की ? दोनों बड़े महत्व के हैं। तब उन्होंने ने यही निर्णय लिया कि अब तक मैंने वही किया जिसका मुझे प्रत्यक्ष आदेश मिला था, इसलिए अब तक मैं खुला था। अब आगे का कार्य तो, जो परोक्ष आदेश से होने वाला है, वहाँ तो कराने वाला ही जाने। इसलिए बँधकर ही चलूँ, करानेवाला चाहे जो करा ले।
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