Wednesday, 4 November 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

         रामचरितमानस में मन के रोगों के जो लक्षण बताये गये हैं, निदान और चिकित्सा की जो पद्धति प्रस्तुत की गयी है, उनके द्वारा यदि हम अपने अन्तर्जीवन में विद्यमान रोगों को ठीक-ठीक समझ सकें और उससे मुक्त होने के लिए उस चिकित्सा-पद्धति को ह्रदयंगम कर सके, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे जीवन के अधिकांश मानस-रोगों का उपशमन हो जायेगा।
          मानस-रोग कहने पर साधारणतया केवल मन के रोगों का अर्थ ही ध्वनित होता है, लेकिन यहाँ पर मन बड़े व्यापक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। मनुष्य के अन्तःकरण को चार भागों में विभक्त किया गया है, जिन्हें मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार कहते हैं। इन चारों के समुच्चय को अन्तःकरण-चतुष्टय कहते हैं। मानस-रोगों के संदर्भ में मन इस समग्र अन्तःकरण-चतुष्टय का बोधक है। इसलिए वे मानस-रोग जो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को केन्द्र बनाकर प्रकट होते हैं, मानस-रोग कहलाते हैं। मानस-रोगों के स्वरूप को समझने के लिए अन्तःकरण पर भी एक दृष्टि डालना उपयोगी होगा। जो संकल्प-विकल्प का केन्द्र है अर्थात जहाँ से संकल्प-विकल्प उठते हैं उसे मन कहते हैं। जिसके द्वारा हम निर्णय करते हैं, किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं वह बुद्धि है। जो स्वीकृति देने वाला है वह अहंकार है और इन सबके पीछे जहाँ जन्मान्तर के संस्कार संग्रहीत हैं वह चित्त है। इनमें एक, दो या सभी विकारग्रस्त हो जाते हैं, जिस पर रामचरितमानस में मानस-रोग के रूप में चर्चा की गयी है।

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